शाम के छः बज रहे थे| गाँव मे तो सांझा चूल्हा भी जल्दी हो जाता है, और सात बजे तक खाना पीना करके निश्चिंत| मेरी उम्र यही कोई ६-७ वर्ष की रही होगी| सामने खाने की थाली रखी थी, लकिन मेरी आँखे अभी भी दरवाजे पे टकटकी लगाए थी, और कान जैसे बाबा की साइकल की घंटी सुनने के लिए बेचैन| ना तो पिताजी आज कोई खिलोना लाने वाले थे और ना ही मिठाई, फिर क्या वजह थी| जैसे ही बाबा की साइकल गली मे घुसती थी, बाबा आदतन साइकल की घंटी बजाते थे| अब इतने सालो मे तो घंटी की आवाज़ तक पहचानने लगा था मैं| कभी कभी वही घंटी हमे आगाह भी करती, और हम झट से पढ़ने बैठ जाते| लेकिन आज माजरा कुछ और था| कहते हैं ना की जैस जैसे उम्र बढ़ती है, दिमाग़ का विकास भी उतनी ही तेज़ी से बढ़ता है, लेकिन मेरा मन सकारात्मक तरीके छोड़ बुरी चीज़ो के प्रति ज़्यादा खिचता था| और उसी शैतानी दिमाग़ की पैदाइश एक तरकीब को मैं आज अंजाम देने वाला था|
बरामदे मे साइकल खड़ी करके, सिकड लगा दी फिर पैर धो के बाबा ओसारे मे आए, जहाँ मैं खाने बैठा था| मुझे पता था की हर रोज की तरह आज भी बाबा जब कपड़े बदलेगें तो उनके कुर्ते की उपरी जेब मे रखे कुछ सिक्के ज़रूर गीरेंगे | और ठीक वैसा ही हुआ, टना टन करते हुए ३-४ सिक्के गिरे| मैने बाबा से कहा, बाबा आप रुकिये मैं उन्हे उठा के देता हूँ| सिक्कों की भी अजीब फ़ितरत होती है, जब वो गिरते हैं तो नाचते हुए ना जाने किस कोने मे छीप जाएँ, और हमारे छोटे से घर मे तो ऐसे कई छुपने के कोने थे| मैने ध्यान से देखा, ४ सिक्के गिरे थे, ३ को उठाया और एक को जान बुझ पास रखे टीन के बक्से के पीछे धकेल दिया| अब बाबा को क्या पता कितने सिक्के गिरे, आँखों मे ईमानदारी की झूठी रोशनी चमकाते हुए मैने उन्हे ३ सिक्के उठा के दे दिए और पिताजी ने शाबासी भी दी| तब से मैं मौका ढूँढ रहा था की जब कोई ओसारे मे ना रहे तब बक्से के पीछे से उस सिक्के को निकाल लूँ| शायद पहली बार इतनी बेचैनी मन मे उठी थी| एक तरफ मन मे सोचने लगा की कल स्कूल से आते वक्त उस पैसे से क्या क्या चीज़े लूँगा खाने के लिए| मन मे एक द्वंद सा उठा, लेमनचूस, आइस्क्रीम, बर्फ के गोले, चटकारे वाली पाचक की गोली और ना जाने क्या क्या| जीभ पे एक एक करके सारी चीज़ो का जायका आ रहा था| एक उत्सुकता ये भी थी की, अभी तक ये भी पता नही की वो सिक्का कितने का है, आठ आने हैं या पूरा एक रुपया| अब अंधेरे मे आकार से कुछ पता नही चला लेकिन एक बात तय थी की चार आना तो नही था|
जैसे ही कानो को यकीन हुआ की अब ओसारे मे से सब लोग अपने अपने कमरे मे चले गये हैं , तब जाके मैं पानी पीने के बहाने उठा और ब्क़्से के पीछे से सिक्के को निकाला, वाह! पूरा एक रुपया, मेरी खुशी का तो ठिकाना ना रहा| पहले जाके उसे अपने बस्ते मे रख लिया| पहले बेचैनी से नींद नही आ रही थी और अब मारे खुशी के| अगले दिन स्कूल के मध्यांतर मे ही आठ आने का गोल गप्पा खाया, चार आने की टाफी और चार आने का पाचक की गोली| दिल मे वही खुशी की लहर उठी जो किसी मुगल बादशाह को लाल किले पे फ़तेह करके आई होगी|
पहली चोरी इतनी आसान रही और फल इतने मीठे, की मैं और प्रोत्साहित हो गया| अब मेहनत के रास्ते पे कोई मज़ा नही आता था, उल्टे तकलीफ़ और दुखदायी दिखते थे| अब मुझे पैसे चोरी की लत लग गयी थी| और दिमाग़ हमेशा नये नये तरकीब बनाने मे लगा रहता था| पहले चार आने, आठ आने से काम चल जाता था, फिर एक रुपए और बाद मे ऐसा लगता था की भाई २ रुपए से कम हाथ मारा तो क्या मज़ा| अब गिरे हुए सिक्के को छुपाना और बाद मे उसे निकालने का तरीका काफ़ी लंबा लगने लगा| बाबा अपना कुर्ता दीवार पे लगे खूटे मे ताँगते थे, जो पलंग से सटा हुआ था| पलंग पे चढ़ के कुर्ते की पॉकेट मे हाथ डाला और जितना निकल जाए, एक झटके मे बड़ा हाथ| लेकिन मैं ये भी ध्यान रखता था की जेब एकदम हल्की ना हो जाए और मैं पकड़ा जाउ| एक दो बार पिताजी को शक हुआ की पैसे कुछ कम रहे हैं जेब से, सो कुछ हफ्ते तक मैने चोरी पे रोक लगा दिया| लेकिन शेर मे मूह मे एक बार खून लग जाए तो कहाँ रुकता वो किसी के रोके| अब उस डब्बे पे हाथ सॉफ किया जिसमे बाबा सारा पैसा रखते थे| लेकिन एक समस्या आने लगी थी अब| खाने पीने की चीज़े मैं आराम से ले सकता था, क्योंकि बाहर मैने क्या खाया ये किसी को पता नही चलता था, लेकिन जब मेरा मान गेंद या कोई और खिलोना लेने को होता तो यह सोच के रुक जाता की घर मे जब कोई पूछेगा की कहाँ से आया तो क्या कहूँगा| लेकिन अब इच्छा इतनी बढ़ गयी थी की पीछे हटना नामुमकिन था| समस्या का हल – दिमाग़ दौड़के कोई और तरकिब निकलना|
पहले एक गेंद खरीदा, लेकिन कोई भी देख के कह सकता था की ये नयी गेंद है| स्कूल से आते वक़्त उसे रास्ते मे घिसता, उस पे कुछ धूल मिट्टी लगता ताकि वो थोड़ा पुराना दिखे| और आते के साथ छत पे जाके उसे गमले के पीछे रख देता| खाने के बाद जब सब लोग खेलने के लिए छत पे जाते, मैं ये ध्यान रखता की सबसे पहले मैं पहुँचू| और जाते के साथ उस गेंद को निकल लेता और कहता – किसी की गेंद हमारे छत पे आ गिरी और अब ये मेरा है| लेकिन ये तरकीब भी ज़्यादा काम ना आई – लोगो का शक बढ़ता जा रहा था| भाई साहब हमेशा पूछते – ये सब गेंद हर बार तुम्हे ही क्यूँ मिलते हैं, और तुम्हारे इतने अच्छे दोस्त कौन है जो अपने खिलोने तुम्हे दे देते हैं| इसका जवाब कुछ ना होता मेरे पास, लेकिन यकीन था की भाई साहब कुछ साबित नही कर सकते|
दीवाली मे, लक्ष्मी पूजा के बाद, लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति हमलोग पूजा घर मे रख देते हैं| और लक्ष्मी की मूर्ति के पास कुछ खूदरे पैसे भी| जब मेरे पैसे चोरी के सारे रास्ते बंद हो गये तो मैने भी भगवान की शरण ली| गर्मी की छुट्टियाँ चल रही थी, सब लोग दोपहर मे सो रहे थे| मौका देखते ही मैने लक्ष्मी-गणेश जी की मूर्ति के पास से कुछ सिक्के उठा लिए| बाद मे गिन के देखा तो कुल मिला के आठ रुपये निकले| इस बार तो मैं बहुत अच्छा खिलोना खरीद सकता था| लेकिन कहते हैं ना की, जब नाश मनुष्य पर छाता है पहले विवेक मार जाता है| हमारे घर के पास ही एक परचून की दुकान थी, जहाँ नये नये डिज़ाइन वाले पेन्सिल, इन्स्ट्रुमेंट बॉक्स और रबर आए थे जो मेरे मन मे बस गया था| वहाँ एक पेन्सिल रबर का सेट था, क्रिकेट के बॅट, बॉल, स्टंप्स बने हुए| मैने वो खरीद लिया| कुछ दीनो तक तो मैं उसे सिर्फ़ स्कूल मे इस्तेमाल करता था, लेकिन एक दिन वो मेरे बस्ते से गिर गया जिसे मेरे भाई साहब ने देख लिया| फिर क्या था भाई साहब तो लगे हुए ही थे सबूत की तलाश मे, इस से अच्छा सबूत उन्हे क्या मिलता| आज शाम को तो शामत आने वाली थी| पहले तो पिताजी ने नर्मी से पूछा, फिर बाद मे दो चार हाथ भी लगे, लेकिन मेरे मूह खुलवाने के लिए इतना काफ़ी ना था| ये सिलसिला घंटो चलता रहा, फिर ना जाने कहाँ से किसी को याद आया की लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति के पास से कुछ पैसे कम गये हैं| अब तक घर मे सबको यकीन था की मैने ही पैसे चुराए हैं, बस सब ताजुब्ब इस बात पे थे की मैने अपना मूह नही खोला| बहुत मार पड़ी, फिर बाबा ने पूछा की ये पेन्सिल रबर का सेट कहाँ से खरीदा है, तब भाई साहब ने आग मे घी डाल दी- और बता दिया की ऐसा वाला सेट मैने अपने सामने वाले दुकान मे देखा था| उसी वक्त, उसी हालत मे बाबा मुझे उस दुकान पे ले गये| अब सब दूध का दूध और पानी का पानी हो गया था| अब मेरे पास इस चोरी को स्वीकार करने के अलावा और कोई चारा ना था| अब पूरे मुहल्ले मे पान की चौकी से लेके बानिए की दुकान तक सब दुकान मे ये ऐलान कर दिया गया था, की अगर मैं कुछ खरीदने आऊ तो मुझे वो नही दिया जाए|
मुझसे वचन दिलवाया गया की मैं आज के बाद पैसे चोरी नही करूँगा| लेकिन मुझे खुद मुझे पे इतना भरोसा था की मैं इस वचन को नही मानता| उल्टे मैं मन मे सोचता था, की अब चोरी बहुत ही सावधानी से करनी होगी, कुछ और नया सोचना पड़ेगा|
एक दिन घर पे सत्यनारायण पूजा थी, सभी भाई बंधु, रिश्ते नाते के लोग आए थे| जब पूजा समाप्त हुई तो घर का सबसे छोटा होने के नाते मुझे कहा गया की जाओ सब को आरती दिखे के लाओ| जब मैं आरती की थाल लेके लोगो के पास जाता, तो लोग आरती लेते और चार आना, आठ आना निकाल के थाल मे रख देते| बस मेरे दिमाग़ ने कहा की इस सुनहरे अवसर को हाथ से गवाया ना जाए| आज यान्हा हाथ सॉफ किया तो अगले कुछ महीनो तक चोरी की ज़रूरत नही, और आज तो किसी को पता भी नही चलेगा की थाल मे कितने पैसे चढ़ाए गये| अपने घर से निकल कर मैं चाचाजी के घर जाके आरती की थाल दिखा के लाया, अब ताऊ जी के घर जाने के बाद गली से होते हुए वापस अपने घर आते वक़्त हमने सोचा यही मौका है| थाल मे कुछ पैसे छोड़ के मैने बाकी के सारे पैसे उठाए और फट से अपने निकर की जेब मे रख लिया| इतने मे आवाज़ आई – “अरे ये क्या कर रहे हो”| मेरे तो जैसे पैरो के नीचे से ज़मीन खिसक गयी| सर उठा के देखा तो ताई जी ने मुझे छत के उपर से देख लिया पैसे उठाते हुए| घर पहुँचा, आरती की थाली जब पंडित जी को दिया तो बोले – अरे दक्षिणा बहुत कम आई इस बार| मैं बिना कुछ बोले निकल गया – अब मन मे ये डर उठता रहा की अगर ताई जी ये बात बाबा को बता दी तो क्या होगा|
इस बार तो पहले से भी ज़्यादा दर्दनाक मार पड़ेगी| चोरी का डर इतना ना था जितना वचन तोड़ने वाले झूठे साबित होने का| क्योंकि इस बार अगर मेरी चोरी पकड़ी गयी है रंगे हाथों और आज के बाद मुझपे कोई विश्वास नही करेगा| इतना डर मुझे परीक्षा मे फेल होने का भी नही होता था| शायद मैं समझ रहा था की सबसे असहनिए दुनिया मे कुछ होता है तो वो है – क्सिी की नज़रो मे गिर जाना| अब तो पल पल बस यही लग रहा था की अब ताई जी आएँगी और उसके बाद प्रलय|
कुछ देर बाद पूजा का न्योता चालू हो गया| आज तो पूरे रिश्तेदार, नातेवाले, आए हुए हैं| आज की बेइज़्ज़ती शायद मे बर्दाशत नही कर सकता| सामने अच्छे अच्छे पकवान थे. पूरी, हलवा लेकिन हृदय के दर्द ने जैसे जिहवा का स्वाद लील लिया हो| जैसे ही ताई जी मेरे सामने आई, साँसे इतनी भारी हो गयी की मानो कोई विष लगा तीर गले के पार हो रहा है| मन हुआ की ताई जी से माफी माँग लू, लेकिन अब तो कोई मेरे माफी माँगने पे भी विषबास नही करेगा| उसके बाद वो हुआ जिसकी कल्पना मैने कभी सपने मे भी नही की थी| ताई जी ने किसी से कुछ नही कहा, लेकिन मुझे यह अहसास दिला दिया की वो समझती है की अगर उन्होने ये बात बाबा को बता दी तो क्या होगा और मूक नज़रो से मुझे ये भी बता दिया की ऐसी ग़लती कभी ना करना|
प्रायशचित के आँसू आज पहली बार अपने आप इन नेत्रो से गिरे थे| पिताजी मुझे सुधारने के लिए, साम दाम दंड भेद सब अपना चुके थे, लेकिन उनकी भागीरथी प्रयास जो बिफल हो गयी थी आज ताई जी के प्रेम और क्षमा ने कर दिखाया था| और अब मैं समझ चुका था, क्षमा मे वो शक्ति होती है जो शायद किसी बड़े से बड़े अस्त्र सश्त्र मे भी नही|