<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"
	>

<channel>
	<title>अभिव्यक्ति मेरे अंतर्मन की</title>
	<atom:link href="http://abhivyaktii.wordpress.com/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://abhivyaktii.wordpress.com</link>
	<description>बाल-स्मृति के पन्नो से - शशि सुधाँशु</description>
	<lastBuildDate>Wed, 15 Dec 2010 10:32:04 +0000</lastBuildDate>
	<language>hi</language>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
	<generator>http://wordpress.com/</generator>
<cloud domain='abhivyaktii.wordpress.com' port='80' path='/?rsscloud=notify' registerProcedure='' protocol='http-post' />
<image>
		<url>http://0.gravatar.com/blavatar/0c26c842420dfb2e881e5beaa9e5bea9?s=96&#038;d=http%3A%2F%2Fs2.wp.com%2Fi%2Fbuttonw-com.png</url>
		<title>अभिव्यक्ति मेरे अंतर्मन की</title>
		<link>http://abhivyaktii.wordpress.com</link>
	</image>
	<atom:link rel="search" type="application/opensearchdescription+xml" href="http://abhivyaktii.wordpress.com/osd.xml" title="अभिव्यक्ति मेरे अंतर्मन की" />
	<atom:link rel='hub' href='http://abhivyaktii.wordpress.com/?pushpress=hub'/>
		<item>
		<title>कमाई</title>
		<link>http://abhivyaktii.wordpress.com/2010/05/09/%e0%a4%95%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%88/</link>
		<comments>http://abhivyaktii.wordpress.com/2010/05/09/%e0%a4%95%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%88/#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 09 May 2010 08:03:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shashi Sudhanshu</dc:creator>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://abhivyaktii.wordpress.com/?p=40</guid>
		<description><![CDATA[आज ओसारे मे एक अजब तरह का सन्नाटा था, ऐसा ना था की वहाँ लोग ना थे, लोग तो थे लेकिन आज मान पड़ता था कि भावनाओं ने शब्दों की जगह आसुओं से काम लेने की ठान ली थी &#124; गंगाजल की कटोरी मे तुलसी के दो पत्ते , भजन- संग्रह की एक पुरानी सी [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=abhivyaktii.wordpress.com&amp;blog=8736772&amp;post=40&amp;subd=abhivyaktii&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>आज ओसारे मे एक अजब तरह का सन्नाटा था, ऐसा ना था की वहाँ लोग ना थे, लोग तो थे लेकिन आज मान पड़ता था कि भावनाओं ने शब्दों की जगह आसुओं से काम लेने की ठान ली थी | गंगाजल की कटोरी मे तुलसी के दो पत्ते , भजन- संग्रह की एक पुरानी सी पुस्तक, तेल मे सनी एक लाठी और उसी काली हो पड़ी लकड़ी की खाट पे रामविलास जी की आखरी साँस लेती दुर्बल शरीर सुकून से लेटी थी| </p>
<p>सिरहाने उनकी पत्नी, पाँचों बहू-बेटे और नाती-पोते सब उनके आस पास ही थे |  सारा परिवार आज संताप मे डूबा हुआ था, लेकिन मृत्यु-शय्या पे रामविलास जी को जैसे कोई तकलीफ़ की अनुभूति ना हो रही थी| उनकी बूढ़ी नज़रे जैसे एक नज़र मे वो सब कुछ भर लेना चाहती थी जो उन्होने अपने पूरे जीवन मे कमाई थी| उपर वही खपरैल वाली छप्पर जिसे उन्होने अपने पाँचो बेटों के साथ खुद अपने हाथों से बाँधा था, बगल मे एक पुरानी अलमारी थी, जिसमे रखे वो सारे पुरस्कार और मेडल्स जो रामविलास जी ने पहलवानी, लाठिवाजी, और किसानी मे कमाए थे, देखते ही जैसे एक नया जोश आ गया था| उनका लक्वा ग्रशत शरीर मानो अब उठ खड़ा होगा| बहुएँ पैर दबा रहीं थी, पाँचो बेटे उनका हाथ थामे हुए थे, सब नाती-पोते खाट के बगल मे ही थे| और रामविलास जी जैसे कहना चाह रहे थे की इस से सुखद विदाई शायद और कुछ नही दुनिया मे| उन्होने जैसे आशीर्वाद मे अपना हाथ उठाया, सबसे बड़े बेटे ने उन्हे गंगाजल की दो बूँद पिलाई और उसके बाद रामविलास जी ने अपनी आखरी सांस ली|</p>
<p>१९०५ से १९८७ तक का रमवा से &#8216;रामविलास जी&#8217; जी का सफ़र इतना आसान ना था | निर्धानता के अंधेरो मे मेहनत की रोशनी कैसे सुकून देती है, इसका मिसाल स्थापित कर गये थे रामविलास जी| विरासत के नाम मे एक छोटी सी ज़मीन और तन ढकने को एक धोती के अलावा अदम्य साहस और कठोर परिश्रम की लगन उन्हे अपने पिताजी से मिली थी | कुल मिलकर अगर ये कहा जाए की उन्हे अपने जिंदगी शून्या से शुरू की थी तो कोई अतिशयोक्ति ना होगी | </p>
<p>अगली सुबह पूरा कस्बा जमा हुया था उनके अंतिम दर्शन के लिए, आस पास के गाओं से भी लोग आए थे उनकी अंतिम यात्रा मे शामिल होने के लिए | ताशे-बजे, भजन-मंडली के निरगुन और पीछे हज़ारों लोगो की नम्र आँखों| </p>
<p>उस समय ६ साल के उनके पोते के मन मे ये सवाल उठा था की इतने निर्धन व्यक्ति ने ऐसी क्या चीज़ कमाई जिस से इतना सुख बटोर ले गये वो अपने साथ|</p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/abhivyaktii.wordpress.com/40/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/abhivyaktii.wordpress.com/40/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/abhivyaktii.wordpress.com/40/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/abhivyaktii.wordpress.com/40/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/abhivyaktii.wordpress.com/40/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/abhivyaktii.wordpress.com/40/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/abhivyaktii.wordpress.com/40/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/abhivyaktii.wordpress.com/40/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/abhivyaktii.wordpress.com/40/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/abhivyaktii.wordpress.com/40/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/abhivyaktii.wordpress.com/40/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/abhivyaktii.wordpress.com/40/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/abhivyaktii.wordpress.com/40/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/abhivyaktii.wordpress.com/40/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=abhivyaktii.wordpress.com&amp;blog=8736772&amp;post=40&amp;subd=abhivyaktii&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://abhivyaktii.wordpress.com/2010/05/09/%e0%a4%95%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%88/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>6</slash:comments>
	
		<media:content url="http://0.gravatar.com/avatar/addfa2eed21f7bb4fa5905778c1b3202?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">shashi</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>एक चोर की कहानी</title>
		<link>http://abhivyaktii.wordpress.com/2010/03/28/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%9a%e0%a5%8b%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80/</link>
		<comments>http://abhivyaktii.wordpress.com/2010/03/28/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%9a%e0%a5%8b%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80/#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 28 Mar 2010 13:26:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shashi Sudhanshu</dc:creator>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://abhivyaktii.wordpress.com/?p=35</guid>
		<description><![CDATA[शाम के छः बज रहे थे&#124; गाँव मे तो सांझा चूल्हा भी जल्दी हो जाता है, और सात बजे तक खाना पीना करके निश्चिंत&#124; मेरी उम्र यही कोई ६-७ वर्ष की रही होगी&#124; सामने खाने की थाली रखी थी, लकिन मेरी आँखे अभी भी दरवाजे पे टकटकी लगाए थी, और कान जैसे बाबा की साइकल [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=abhivyaktii.wordpress.com&amp;blog=8736772&amp;post=35&amp;subd=abhivyaktii&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>शाम के छः बज रहे थे| गाँव मे तो सांझा चूल्हा भी जल्दी हो जाता है, और सात बजे तक खाना पीना करके निश्चिंत| मेरी उम्र यही कोई ६-७ वर्ष की रही होगी| सामने खाने की थाली रखी थी, लकिन मेरी आँखे अभी भी दरवाजे पे टकटकी लगाए थी, और कान जैसे बाबा की साइकल की घंटी सुनने के लिए बेचैन| ना तो पिताजी आज कोई खिलोना लाने वाले थे और ना ही मिठाई, फिर क्या वजह थी| जैसे ही बाबा की साइकल गली मे घुसती थी, बाबा आदतन साइकल की घंटी बजाते थे| अब इतने सालो मे तो घंटी की आवाज़ तक पहचानने लगा था मैं| कभी कभी वही घंटी हमे आगाह भी करती, और हम झट से पढ़ने बैठ जाते| लेकिन आज माजरा कुछ और था| कहते हैं ना की जैस जैसे उम्र बढ़ती है, दिमाग़ का विकास भी उतनी ही तेज़ी से बढ़ता है, लेकिन मेरा मन सकारात्मक तरीके छोड़ बुरी चीज़ो के प्रति ज़्यादा खिचता था| और उसी शैतानी दिमाग़ की पैदाइश एक तरकीब को मैं आज अंजाम देने वाला था|</p>
<p>बरामदे मे साइकल खड़ी करके, सिकड लगा दी फिर पैर धो के बाबा ओसारे मे आए, जहाँ मैं खाने बैठा था| मुझे पता था की हर रोज की तरह आज भी बाबा जब कपड़े बदलेगें तो उनके कुर्ते की उपरी जेब मे रखे कुछ सिक्के ज़रूर गीरेंगे | और ठीक वैसा ही हुआ, टना टन करते हुए ३-४ सिक्के गिरे| मैने बाबा से कहा, बाबा आप रुकिये मैं उन्हे उठा के देता हूँ| सिक्कों की भी अजीब फ़ितरत होती है, जब वो गिरते हैं तो नाचते हुए ना जाने किस कोने मे छीप जाएँ, और हमारे छोटे से घर मे तो ऐसे कई छुपने के कोने थे| मैने ध्यान से देखा, ४ सिक्के गिरे थे, ३ को उठाया और एक को जान बुझ पास रखे टीन के बक्से के पीछे धकेल दिया| अब बाबा को क्या पता कितने सिक्के गिरे, आँखों मे ईमानदारी की झूठी रोशनी चमकाते हुए मैने उन्हे ३ सिक्के उठा के दे दिए और पिताजी ने शाबासी भी दी| तब से मैं मौका ढूँढ रहा था की जब कोई ओसारे मे ना रहे तब बक्से के पीछे से उस सिक्के को निकाल लूँ| शायद पहली बार इतनी बेचैनी मन मे उठी थी| एक तरफ मन मे सोचने लगा की कल स्कूल से आते वक्त उस पैसे से क्या क्या चीज़े लूँगा खाने के लिए| मन मे एक द्वंद सा उठा, लेमनचूस, आइस्क्रीम, बर्फ के गोले, चटकारे वाली पाचक की गोली और ना जाने क्या क्या| जीभ पे एक एक करके सारी चीज़ो का जायका आ रहा था| एक उत्सुकता ये भी थी की, अभी तक ये भी पता नही की वो सिक्का कितने का है, आठ आने हैं या पूरा एक रुपया| अब अंधेरे मे आकार से कुछ पता नही चला लेकिन एक बात तय थी की चार आना तो नही था|</p>
<p>  जैसे ही कानो को यकीन हुआ की अब ओसारे मे से सब लोग अपने अपने कमरे मे चले गये हैं , तब जाके मैं पानी पीने के बहाने उठा और ब्क़्से के पीछे से सिक्के को निकाला, वाह! पूरा एक रुपया, मेरी खुशी का तो ठिकाना ना रहा| पहले जाके उसे अपने बस्ते मे रख लिया| पहले बेचैनी से नींद नही आ रही थी और अब मारे खुशी के| अगले दिन स्कूल के मध्यांतर मे ही आठ आने का गोल गप्पा खाया, चार आने की टाफी और चार आने का पाचक की गोली| दिल मे वही खुशी की लहर उठी जो किसी मुगल बादशाह को लाल किले पे फ़तेह करके आई होगी| </p>
<p>पहली चोरी इतनी आसान रही और फल इतने मीठे, की मैं और प्रोत्साहित हो गया| अब मेहनत के रास्ते पे कोई मज़ा नही आता था, उल्टे तकलीफ़ और दुखदायी दिखते थे| अब मुझे पैसे चोरी की लत लग गयी थी| और दिमाग़ हमेशा नये नये तरकीब बनाने मे लगा रहता था| पहले चार आने, आठ आने से काम चल जाता था, फिर एक रुपए और बाद मे ऐसा लगता था की भाई २ रुपए से कम हाथ मारा तो क्या मज़ा| अब गिरे हुए सिक्के को छुपाना और बाद मे उसे निकालने का तरीका काफ़ी लंबा लगने लगा| बाबा अपना कुर्ता दीवार पे लगे खूटे मे ताँगते थे, जो पलंग से सटा हुआ था| पलंग पे चढ़ के कुर्ते की पॉकेट मे हाथ डाला और जितना निकल जाए, एक झटके मे बड़ा हाथ| लेकिन मैं ये भी ध्यान रखता था की जेब एकदम हल्की ना हो जाए और मैं पकड़ा जाउ| एक दो बार पिताजी को शक हुआ की पैसे कुछ कम रहे हैं जेब से, सो कुछ हफ्ते तक मैने चोरी पे रोक लगा दिया| लेकिन शेर मे मूह मे एक बार खून लग जाए तो कहाँ रुकता वो किसी के रोके| अब उस डब्बे पे हाथ सॉफ किया जिसमे बाबा सारा पैसा रखते थे| लेकिन एक समस्या आने लगी थी अब| खाने पीने की चीज़े मैं आराम से ले सकता था, क्योंकि बाहर मैने क्या खाया ये किसी को पता नही चलता था, लेकिन जब मेरा मान गेंद या कोई और खिलोना लेने को होता तो यह सोच के रुक जाता की घर मे जब कोई पूछेगा की कहाँ से आया तो क्या कहूँगा| लेकिन अब इच्छा इतनी बढ़ गयी थी की पीछे हटना नामुमकिन था| समस्या का हल &#8211; दिमाग़ दौड़के कोई और तरकिब निकलना| </p>
<p>पहले एक गेंद खरीदा, लेकिन कोई भी देख के कह सकता था की ये नयी गेंद है| स्कूल से आते वक़्त उसे रास्ते मे घिसता, उस पे कुछ धूल मिट्टी लगता ताकि वो थोड़ा पुराना दिखे| और आते के साथ छत पे जाके उसे गमले के पीछे रख देता| खाने के बाद जब सब लोग खेलने के लिए छत पे जाते, मैं ये ध्यान रखता की सबसे पहले मैं पहुँचू| और जाते के साथ उस गेंद को निकल लेता और कहता &#8211; किसी की गेंद हमारे छत पे आ गिरी और अब ये मेरा है| लेकिन ये तरकीब भी ज़्यादा काम ना आई &#8211; लोगो का शक बढ़ता जा रहा था| भाई साहब हमेशा पूछते &#8211; ये सब गेंद हर बार तुम्हे ही क्यूँ मिलते हैं, और तुम्हारे इतने अच्छे दोस्त कौन है जो अपने खिलोने तुम्हे दे देते हैं| इसका जवाब कुछ ना होता मेरे पास, लेकिन यकीन था की भाई साहब कुछ साबित नही कर सकते|</p>
<p>दीवाली मे, लक्ष्मी पूजा के बाद, लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति हमलोग पूजा घर मे रख देते हैं| और लक्ष्मी की मूर्ति के पास कुछ खूदरे पैसे भी| जब मेरे पैसे चोरी के सारे रास्ते बंद हो गये तो मैने भी भगवान की शरण ली| गर्मी की छुट्टियाँ चल रही थी, सब लोग दोपहर मे सो रहे थे| मौका देखते ही मैने लक्ष्मी-गणेश जी की मूर्ति के पास से कुछ सिक्के उठा लिए| बाद मे गिन के देखा तो कुल मिला के आठ रुपये निकले| इस बार तो मैं बहुत अच्छा खिलोना खरीद सकता था| लेकिन कहते हैं ना की, जब नाश मनुष्य पर छाता है पहले विवेक मार जाता है| हमारे घर के पास ही एक परचून की दुकान थी, जहाँ नये नये डिज़ाइन वाले पेन्सिल, इन्स्ट्रुमेंट बॉक्स और रबर आए थे जो मेरे मन मे बस गया था| वहाँ एक पेन्सिल रबर का सेट था, क्रिकेट के बॅट, बॉल, स्टंप्स बने हुए| मैने वो खरीद लिया| कुछ दीनो तक तो मैं उसे सिर्फ़ स्कूल मे इस्तेमाल करता था, लेकिन एक दिन वो मेरे बस्ते से गिर गया जिसे मेरे भाई साहब ने देख लिया| फिर क्या था भाई साहब तो लगे हुए ही थे सबूत की तलाश मे, इस से अच्छा सबूत उन्हे क्या मिलता| आज शाम को तो शामत आने वाली थी| पहले तो पिताजी ने नर्मी से पूछा, फिर बाद मे दो चार हाथ भी लगे, लेकिन मेरे मूह खुलवाने के लिए इतना काफ़ी ना था| ये सिलसिला घंटो चलता रहा, फिर ना जाने कहाँ से किसी को याद आया की लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति के पास से कुछ पैसे कम गये हैं| अब तक घर मे सबको यकीन था की मैने ही पैसे चुराए हैं, बस सब ताजुब्ब इस बात पे थे की मैने अपना मूह नही खोला| बहुत मार पड़ी, फिर बाबा ने पूछा की ये पेन्सिल रबर का सेट कहाँ से खरीदा है, तब भाई साहब ने आग मे घी डाल दी- और बता दिया की ऐसा वाला सेट मैने अपने सामने वाले दुकान मे देखा था| उसी वक्त, उसी हालत मे बाबा मुझे उस दुकान पे ले गये| अब सब दूध का दूध और पानी का पानी हो गया था| अब मेरे पास इस चोरी को स्वीकार करने के अलावा और कोई चारा ना था| अब पूरे मुहल्ले मे पान की चौकी से लेके बानिए की दुकान  तक सब दुकान मे ये ऐलान कर दिया गया था, की अगर मैं कुछ खरीदने आऊ तो मुझे वो नही दिया जाए|</p>
<p>मुझसे वचन दिलवाया गया की मैं आज के बाद पैसे चोरी नही करूँगा| लेकिन मुझे खुद मुझे पे इतना भरोसा था की मैं इस वचन को नही मानता| उल्टे मैं मन मे सोचता था, की अब चोरी बहुत ही सावधानी से करनी होगी, कुछ और नया सोचना पड़ेगा|</p>
<p>एक दिन घर पे सत्यनारायण पूजा थी, सभी भाई बंधु, रिश्ते नाते के लोग आए थे| जब पूजा समाप्त हुई तो घर का सबसे छोटा होने के नाते मुझे कहा गया की जाओ सब को आरती दिखे के लाओ| जब मैं आरती की थाल लेके लोगो के पास जाता, तो लोग आरती लेते और चार आना, आठ आना निकाल के थाल मे रख देते| बस मेरे दिमाग़ ने कहा की इस सुनहरे अवसर को हाथ से गवाया ना जाए| आज यान्हा हाथ सॉफ किया तो अगले कुछ महीनो तक चोरी की ज़रूरत नही, और आज तो किसी को पता भी नही चलेगा की थाल मे कितने पैसे चढ़ाए गये| अपने घर से निकल कर मैं  चाचाजी के घर जाके आरती की थाल दिखा के लाया, अब ताऊ जी के घर जाने के बाद गली से होते हुए वापस अपने घर आते वक़्त हमने सोचा यही मौका है| थाल मे कुछ पैसे छोड़ के मैने  बाकी के सारे पैसे उठाए और फट से अपने निकर की जेब मे रख लिया| इतने मे आवाज़ आई &#8211; &#8220;अरे ये क्या कर रहे हो&#8221;| मेरे तो जैसे पैरो के नीचे से ज़मीन खिसक गयी| सर उठा के देखा तो ताई जी ने मुझे छत के उपर से देख लिया पैसे उठाते हुए|  घर पहुँचा, आरती की थाली जब पंडित जी को दिया तो बोले &#8211; अरे दक्षिणा बहुत कम आई इस बार| मैं बिना कुछ बोले निकल गया &#8211; अब मन मे ये डर उठता रहा की अगर ताई जी ये बात बाबा को बता दी तो क्या होगा|</p>
<p>इस बार तो पहले से भी ज़्यादा दर्दनाक मार पड़ेगी| चोरी का डर इतना ना था जितना वचन तोड़ने वाले झूठे साबित होने का| क्योंकि इस बार अगर मेरी चोरी पकड़ी गयी है रंगे हाथों और आज के बाद मुझपे कोई विश्वास नही करेगा| इतना डर मुझे परीक्षा मे फेल होने का भी नही होता था| शायद मैं समझ रहा था की सबसे असहनिए दुनिया मे कुछ होता है तो वो है &#8211; क्सिी की नज़रो मे गिर जाना| अब तो पल पल बस यही लग रहा था की अब ताई जी आएँगी और उसके बाद प्रलय|</p>
<p>कुछ देर बाद पूजा का न्योता चालू हो गया| आज तो पूरे रिश्तेदार, नातेवाले, आए हुए हैं| आज की बेइज़्ज़ती शायद मे बर्दाशत नही कर सकता| सामने अच्छे अच्छे पकवान थे. पूरी, हलवा  लेकिन हृदय के दर्द ने जैसे जिहवा का स्वाद लील लिया हो| जैसे ही ताई जी मेरे सामने आई, साँसे इतनी भारी हो गयी की मानो कोई विष लगा तीर गले के पार हो रहा है| मन हुआ की ताई जी से माफी माँग लू, लेकिन अब तो कोई मेरे माफी माँगने पे भी विषबास नही करेगा| उसके बाद वो हुआ जिसकी कल्पना मैने कभी सपने मे भी नही की थी| ताई जी ने किसी से कुछ नही कहा, लेकिन मुझे यह अहसास दिला दिया की वो समझती है की अगर उन्होने ये बात बाबा को बता दी तो क्या होगा और मूक नज़रो से मुझे ये भी बता दिया की ऐसी ग़लती कभी ना करना|</p>
<p>प्रायशचित के आँसू आज पहली बार अपने आप इन नेत्रो से गिरे थे| पिताजी मुझे सुधारने के लिए, साम दाम दंड भेद सब अपना चुके थे, लेकिन उनकी भागीरथी प्रयास जो बिफल हो गयी थी आज ताई जी के प्रेम और क्षमा ने कर दिखाया था| और अब मैं समझ चुका था, क्षमा मे वो शक्ति होती है जो शायद  किसी बड़े से बड़े अस्त्र सश्त्र मे भी नही|</p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/abhivyaktii.wordpress.com/35/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/abhivyaktii.wordpress.com/35/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/abhivyaktii.wordpress.com/35/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/abhivyaktii.wordpress.com/35/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/abhivyaktii.wordpress.com/35/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/abhivyaktii.wordpress.com/35/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/abhivyaktii.wordpress.com/35/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/abhivyaktii.wordpress.com/35/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/abhivyaktii.wordpress.com/35/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/abhivyaktii.wordpress.com/35/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/abhivyaktii.wordpress.com/35/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/abhivyaktii.wordpress.com/35/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/abhivyaktii.wordpress.com/35/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/abhivyaktii.wordpress.com/35/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=abhivyaktii.wordpress.com&amp;blog=8736772&amp;post=35&amp;subd=abhivyaktii&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://abhivyaktii.wordpress.com/2010/03/28/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%9a%e0%a5%8b%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>12</slash:comments>
	
		<media:content url="http://0.gravatar.com/avatar/addfa2eed21f7bb4fa5905778c1b3202?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">shashi</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>कुछ बातें</title>
		<link>http://abhivyaktii.wordpress.com/2010/03/14/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%9b-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%82/</link>
		<comments>http://abhivyaktii.wordpress.com/2010/03/14/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%9b-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%82/#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 14 Mar 2010 19:09:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shashi Sudhanshu</dc:creator>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://abhivyaktii.wordpress.com/?p=33</guid>
		<description><![CDATA[1) ना चख के देखा ना, ना छुआ है अभी, पहचान भी ना सके उस ठूंठ को तुम, जो बताया किसीने की नीम की सुखी ठूंठ है ये, दरखतों से अचानक कड़वाहट क्यूँ झाकने लगे &#124; ना देखा देखा उसे, ना जाना अभी, रिश्ते भी तो तुम्हे बनाने ना थे, जो बताया किसी ने नाम [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=abhivyaktii.wordpress.com&amp;blog=8736772&amp;post=33&amp;subd=abhivyaktii&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>1)<br />
ना चख के देखा ना, ना छुआ है अभी, पहचान भी ना सके उस ठूंठ को तुम, जो बताया किसीने की नीम की सुखी ठूंठ है ये, दरखतों से अचानक कड़वाहट क्यूँ झाकने लगे | </p>
<p>ना देखा देखा उसे, ना जाना अभी, रिश्ते भी तो तुम्हे बनाने ना थे, जो बताया किसी ने नाम जो उसका, मज़हबी कसौटी पे उसकी सीरत क्यूँ भापने लगे |</p>
<p>2)<br />
आँखो से कहते हैं, ज़ुबान से देखते हैं, कानो से सोचते हैं, और दिमाग़ से तौलते हैं, लगता है दिल तो बेचारा बेवजह ही धड़कता है |</p>
<p>3)<br />
जो फायदे की ही ज़ुबान दुनिया समझती है तो मैं कहता हूँ &#8211; नफ़रत की आदत आदमी की ये पुरानी है, क्यूँ का कबाड़ मे ये पुरानी चीज़े बेच के कुछ पैसे कमाए जाए |</p>
<p>4)<br />
ज़ुबान से ज़्यादा ब्यान करती है ये सिलवटें &#8211; चाहे वो माथे की शिकन हो या बिस्तर की चादर |</p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/abhivyaktii.wordpress.com/33/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/abhivyaktii.wordpress.com/33/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/abhivyaktii.wordpress.com/33/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/abhivyaktii.wordpress.com/33/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/abhivyaktii.wordpress.com/33/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/abhivyaktii.wordpress.com/33/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/abhivyaktii.wordpress.com/33/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/abhivyaktii.wordpress.com/33/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/abhivyaktii.wordpress.com/33/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/abhivyaktii.wordpress.com/33/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/abhivyaktii.wordpress.com/33/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/abhivyaktii.wordpress.com/33/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/abhivyaktii.wordpress.com/33/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/abhivyaktii.wordpress.com/33/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=abhivyaktii.wordpress.com&amp;blog=8736772&amp;post=33&amp;subd=abhivyaktii&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://abhivyaktii.wordpress.com/2010/03/14/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%9b-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%82/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
	
		<media:content url="http://0.gravatar.com/avatar/addfa2eed21f7bb4fa5905778c1b3202?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">shashi</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>दिगदर्शक</title>
		<link>http://abhivyaktii.wordpress.com/2010/01/02/%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%97%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%95/</link>
		<comments>http://abhivyaktii.wordpress.com/2010/01/02/%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%97%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%95/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 02 Jan 2010 20:10:47 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shashi Sudhanshu</dc:creator>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://abhivyaktii.wordpress.com/?p=31</guid>
		<description><![CDATA[अपनी सेकेंड हॅंड साइकल पे चंदन कॉलेज के लिए निकल तो गया था, लेकिन उसे छोड़ सबको यकीन था की आज भी कॉलेज पहुँचने मे उसे विलंब होगा&#124; और आज तो सालाना इंतेहान था, वक्त भी अपनी नजकतता इस दिन से ज़्यादा शायद और कभी नही दिखती होगी &#124; वो साइकल चलती कम थी और [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=abhivyaktii.wordpress.com&amp;blog=8736772&amp;post=31&amp;subd=abhivyaktii&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>अपनी सेकेंड हॅंड साइकल पे चंदन कॉलेज के लिए निकल तो गया था, लेकिन उसे छोड़ सबको यकीन था की आज भी कॉलेज पहुँचने मे उसे विलंब होगा| और आज तो सालाना इंतेहान था, वक्त भी अपनी नजकतता इस दिन से ज़्यादा शायद और कभी नही दिखती होगी | वो साइकल चलती कम थी और उसकी चेन ज़्यादा उतरती थी| ये शायद चंदन का सिर्फ़ आत्मविश्वाश ही था जो उसे ठीक समय पे कॉलेज पहुँचा देती थी| जब मैं उस से पूछता की भाई इस पुरानी साइकल मे क्या रखा है, तो उसका जवाब होता &#8211; यार कुछ भी कम से कम चलके आने के मुक़ाबले तो किफायती ही है| </p>
<p>चंदन से मेरी मुलाकात स्नातक मे हुई थी, एक कहावत है की महान हस्तियों के मुख मंडल पे एक अजीब सी आभा होती है, लेकिन इसके विपरीतार्थ, चंदन एक आतयन्त ही सामान्य लड़का था| मोतीहरी जिला मे उसका गाँव था, और पटना मे एक किराय का कमरा लेके रहता था| पटना विश्वविद्यालय के पास ही उसने कमरा ले रखा था, ताकि आने जाने मे वक्त की बचत हो|</p>
<p>वैसे चंदन से जान पहचान तो प्रथम वर्ष मे ही हो गयी थी लेकिन, उसे करीब से जानने का मौका तब मिला जब पहली बार मुझे किसी काम से उसके कमरे पे जाना पड़ा| एक तो पटना की सड़के इतनी तंग की उसे सड़क ना कह के गली कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति ना होगी| एक गली से दूसरे गली होते हुए हम जा रहे थे, आखरी गली ऐसी थी जिसमे से एक वक्त पे एक ही व्यक्ति जा सकता था| गली मे घुसने से पहले देख ले की कोई सामने से कोई आ तो नही रहा| अपने आप मे मूक शब्दों मे सर्वसम्मति करके लोग बड़े आराम से आना जाना करते थे| उस सांकारी गली से होते हुए हम आगे की तरफ बढ़े, सामने एक प्रेस था, जहाँ किताबो की प्रिंटिंग, रंगाई पोताई, बाइंडिंग का काम होता था और पीछे चंदन का कमरा था| कमरे के बाहर दीवार से सटा के साइकल खड़ी की, और कमरे एक अंदर गये| एक छोटा सा कमरा, एक तरफ एक चौकी बिछी थी, चौकी से सटे एक पुराना टेबल, चौकी के उपर दीवार के एक छोड़ से दूसरे छोड़ तक कपड़े रखने के लिए एक रस्सी बँधी थी, एक कोने मे एक छोटा था स्टोव और कुछ बर्तन रखे थे| पूछने पे पता चला चंदन खाना खुद बनाता था| थोड़ी देर बात करने पे उसका दिनचर्या पता चला, सुबेह उठके पढ़ना, नाश्ते के नाम मे कुछ मुंग के दाने फाँक लेना और उसके बात सुबेह के सवा सात बजे कॉलेज पहुचना | आश्चर्याचकित होने के वजाय मैं उसे बड़े सम्मान की दृष्टि से देख रहा था|</p>
<p>वहाँ मैने एक और बात देखी, उस लकड़ी के टेबल पे पुराने अख़बार के पन्ने बिछे थे, जिसके उपेर किताब रखकर वो पढ़ाई करता था| अगर आपने कभी अख़बार के पन्नो को गौड़ से देखा होगा तो आपको मालूम होगा, उसके चारो तरह लगबघ एक इंच की जगह खाली होती है, वो पूरी जगह छोटे छोटे अक्चछरों से भरी पड़ी थी, भाई साहब उस पे रफ वर्क किया करते थे| गणित का हिसाब हो या किसी अँग्रेज़ी शब्द की कंठस्त करने का परिश्रम, वो अख़बार के पन्ने बड़े काम आते थे| जब तक एक कोना भी कोरा रहता, तब तक दूसरे अख़बार के पन्ने उसकी जगह नही लेते थे|</p>
<p>अब हमारी और चंदन की दोस्ती जम गयी थी, मुझे जब मौका मिलता तो मैं वहाँ पढ़ने चला जाता| वैसे मेरी और चंदन की स्थिति मे सिर्फ़ एक ही भिन्नता थी, और वो थी एक सेकेंड हॅंड साइकल की| स्नातकोत्तर की पढ़ाई के लिए देश के सर्व्स्रेस्ठ विश्वविद्यालयों मे दाखिले के लिए अब और परिश्रम करता था| मल्टी नॅशनल कंपनी किस चिड़िया का नाम है, ये मुझे चंदन से ही पता चला था, सही मायने मे मुझे एक दिगदर्शक मिल गया था | </p>
<p>कुछ लोग होते हैं जो आपकी जिंदगी मे भले ही थोड़े पल के लिए आए होंगे, लेकिन वो आप पे ऐसी छाप छोड़ जाते हैं की पूरी जिंदगी उन्हे भुला पाना नामुमकिन होता है| स्नातक डिग्री लेने के बाद हम दोनो के रास्ते अलग हो गये थे| उसके उस ३ वर्ष के साथ मे मैने सीखा &#8211; कैसे हर रात एक ही सपने के साथ सोया जाता है और हर दिन उसी सपने को पूरा करने के लिए किया जाता है परिश्रम | आज आठ वर्ष होने को आए, मैं चंदन से मिला नही, लेकिन आज भी मैं अपने आप को ऋणी मानता हूँ चंदन का, अगर उसके उदारता के प्रकाश मे मुझे अपनी हृदय-हीनता, अपनी आत्म-शून्यता का सही बोध ना होता तो मैं आज ये कहानी ना लिख रहा होता|</p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/abhivyaktii.wordpress.com/31/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/abhivyaktii.wordpress.com/31/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/abhivyaktii.wordpress.com/31/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/abhivyaktii.wordpress.com/31/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/abhivyaktii.wordpress.com/31/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/abhivyaktii.wordpress.com/31/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/abhivyaktii.wordpress.com/31/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/abhivyaktii.wordpress.com/31/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/abhivyaktii.wordpress.com/31/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/abhivyaktii.wordpress.com/31/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/abhivyaktii.wordpress.com/31/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/abhivyaktii.wordpress.com/31/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/abhivyaktii.wordpress.com/31/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/abhivyaktii.wordpress.com/31/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=abhivyaktii.wordpress.com&amp;blog=8736772&amp;post=31&amp;subd=abhivyaktii&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://abhivyaktii.wordpress.com/2010/01/02/%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%97%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%95/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>4</slash:comments>
	
		<media:content url="http://0.gravatar.com/avatar/addfa2eed21f7bb4fa5905778c1b3202?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">shashi</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>साक्षात्कार</title>
		<link>http://abhivyaktii.wordpress.com/2009/11/27/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0/</link>
		<comments>http://abhivyaktii.wordpress.com/2009/11/27/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0/#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 27 Nov 2009 21:25:23 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shashi Sudhanshu</dc:creator>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://abhivyaktii.wordpress.com/?p=27</guid>
		<description><![CDATA[समय के पहिए को जब थोड़ा पीछे लिए चलता हूँ तो एक दृश्य आँखो के सामने आज भी उभर कर आता है &#124; बात १९९७ की है, मैं उस वर्ष दसवीं की बोर्ड परीक्षा देने वाला था &#124; उन दिनो किसी भी सरकारी नौकरी मे भर्रती होना कम गर्व की बात न थी&#124; उस वक्त [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=abhivyaktii.wordpress.com&amp;blog=8736772&amp;post=27&amp;subd=abhivyaktii&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>समय के पहिए को जब थोड़ा पीछे लिए चलता हूँ तो एक दृश्य आँखो के सामने आज भी उभर कर आता है | बात १९९७ की है, मैं उस वर्ष दसवीं की बोर्ड परीक्षा देने वाला था | उन दिनो किसी भी सरकारी नौकरी मे भर्रती होना कम गर्व की बात न थी| उस वक्त न मैने कुछ सोचा था की मुझे जीवन मे क्या करना है और ना ही पिताजी को मेरे सामर्थ्य से कुछ आशा थी | आज शायद वक्त बदल रहा है, लेकिन उन दीनो हर पिता की बस यही तमन्ना होती थी की उसका लड़का किसी सरकारी नौकरी मे अपने बाल बूते पे लग जाए | मुझे याद है किस तरह से तिवारी जी अपना सीना चौड़ा किए अपनी साइकल पे निकलते थे | और हो भी क्यूँ ना, उनका लड़का पढ़ने मे बड़ा होशियार था और अब तो उसकी नौकरी भी लग गयी थी बिहार सरकार के सिंचाई विभाग मे | हमारे यहाँ न तो कोई मल्टी नॅशनल कंपनी थी और ना ही उच्च स्तर की व्यवश्यिक शिक्षा की व्यवस्था |</p>
<p>ले दे के अपना भविशय बनाने के लिए हमारे पास बस एक ही उपाय बचता था &#8211; सरकारी नौकरी | अगर बड़ा अफ़सर बनने की चाहत दिल मे है तो स्नातक के बाद सिविल सर्विसेस की परीक्षा दीजीय नही तो राज्य स्तर पर बी.पी.एस.सी की परीक्षा दीजिए | चाहे बॅंक मे नौकरी चाहिए या रेलवे मे या फिर सेना मे परीक्षा से छुटकारा नही था| हमने सोचा की जब इन्ही सीढ़ियों से गुज़रना है तो क्यूँ ना आज ही अपनी किस्मत आज़माई जाए | फिर क्या था तभी पिताजी रेलवे भर्ती बोर्ड का एक फॉर्म २ रुपये मे खरीद लाए , २० रुपये का ड्राफ्ट लगाया और अर्जी डाल दी| रेलवे हर साल दसवी पास १२० कॅंडिडेट्स का चयन करती है| कोलकाता मे दो साल की रेलवे की पढ़ाई और फिर पास हो जाने पे टी.टी. या टी.सी. की नौकरी |</p>
<p>निर्धारित तिथि को रेलवे भारती बोर्ड की लिखित परीक्षा हुई | परीक्षार्थी की संख्या देख के तो मैं दंग रह गया, और मन मे सोच भी उठी की बिहार मे कितनी बेरोज़गारी है| शायद जिंदगी की वास्तविकता से मेरा यह पहला परिचय था| बिहार के कोने कोने से छात्र आए थे, लाखों की संख्या मे | एक महीने बाद समाचार पत्र मे उस पारीखा का परिणाम भी प्रकाशित हुआ | जितनी अधिरता मुझमे होनी चाहिए थी उस से ज़्यादा पिताजी को थी| यूँ तो हमारे घर अख़बार नही आता था लेकिन उस दिन पिताजी बाकायदा खरीद कर लाए | मैं परीक्षा मे उत्तीर्ण हो चुका था, कुछ साप्ताह बाद रेलवे भर्ती बोर्ड से इंटेरवयहू के लिए बुलावा भी आ गया |</p>
<p>पूरे पूर्व रेलवे मे सिर्फ़ १२० सीटे थी इस नौकरी के लिए, और जिन लोगो को इंटरभ्यू के लिए बुलाया गया था उनकी संख्या थी हज़ारो मे | और सब छात्रो का इंटरव्यू दो दीनो मे ले लेना था और अंतिम सूची प्रकाशित की जानी थी | पटना के रेलवे भर्ती बोर्ड मे मुख्यालय मे इंटरव्यू का आयोजन किया गया था | कहीं बैठने के लिए कोई जगह न थी| कोई चारदीवारी पे बैठा है तो कोई बिल्डिंग के छज्जे के नीचे | एक तो बैठने की कोई व्यवस्था नही और उपेर हे मई का महीना भी अपना असर दिखाने मे कोई कमी नही रखे था| सब लोगो को सुबह १० बजे बुलाया गया था | मैं भी पिताजी के साथ समय से पहले ही पहुँच गया था|</p>
<p>मैं घर से अपना इंटरव्यू देने निकला था, लेकिन मुझे नही पता था की आज मेरा साक्षात्कार जिंदगी के उस वास्तविकता से होने जा रहा है जो मेरे जिंदगी मे एक बहुत बड़ा मोड़ लाएगा| हज़ारो चुने हुए छात्र वान्हा आए हुए थे | कुछ अपने अभिभावकों के साथ तो कुछ अकेले ही | बिहार के कोने कोने से आए थे छात्र | कोई कोई तो छात्र १२-१२ घंटे का सफ़र तय करके आए थे| मेरा रोल नंबर आने मे काफ़ी वक़्त था, और जिस गति से इंटरव्यू चल रही थी, उस से तो शाम के पहले मेरा नंबर आने का कोई संभावना नज़र नही आता था| पिताजी मुझे नौकरी की महत्वता बार बार बता रहे थे, और सामानया ज्ञान के प्रश्न भी पूछ पूछ कर मुझे पूरी तरह से त्यार कर रहे थे|  दिन चाड आया था, भूख भी लगने लगी थी | पिताजी कुछ खाने के लिए लाने चले गये, तभी मेरी नज़र एक युवक पे गयी |</p>
<p>वो मेरी तरफ अपनी पीठ किए बैठा था | पेड़ के छाव वाली जगह पे तो पहले से ही लोगो ने कब्जा जमाया हुआ था, लेकिन फिर भी वो पेड़ के करीब बैठ कर अपने दिल को ये तस्सल्ली दे रहा था की छाव अभी दूर है लेकिन २ घंटे बाद उस तक भी आ जाएगी | अधिकतर लोग अब अपने आस पास बैठे लोगो से बात चीत कर रहे थे| लेकिन ये युवक किसी से बात नही कर रहा था | तभी मेरी नज़र उसके कुर्ते पर पड़ी | उसका कुर्ता बहुत ही पुराना और मैला था, और कंधे पर से कुर्ता फटा हुआ था, जिसे हाथ की सिलाई से ढकने की नाकाम कोशिश भी की गयी थी | उसका बस्ता ये सॉफ बयान कर रहा था की वो दूसरे गाव से आया है| मुझे ना जाने एक कौतुक सा हुआ उसे और करीब से देखने का | उसके बस्ते का आकार बता रहा था की उसके बस्ते मे कुछ ज़्यादा समान नही है, शायद कुछ भी नही| एक दो कागज के टुकड़े, इंटरव्यू का कॉल लेटर बस| वो शायद एकमात्र ऐसा छात्र होगा जो पुराने फटे कुर्ते मे इंटरव्यू देने आया होगा|</p>
<p>मैं थोड़ा आगे बढ़ा उसे और करीब से देखने के लिए| उसके आँखों मे हीन भावना सॉफ झलक रही थी | वो लोगो से नज़र भी नही मिला पा रहा था| लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब तरह की ही आत्मविश्वाश की चमक थी| ये बात तो तय थी की वो अत्यंत ग़रीब था| इतना ग़रीब की जिस इंटरव्यू मे लोग अपना सबसे बढ़िया कुर्ता पहन के जाते है, उस इंटरव्यू मे आने के लिए उसके पास सिर्फ़ यही फटा कुर्ता उसके सबसे बढ़िया कुर्ता था, या शायद उसका एकमात्र कुर्ता| </p>
<p>तभी उसने अपने बस्ते मे हाथ डाला और अंदर से अख़बार के पन्ने मे लिपटी हुई कोई चीज़ निकाली | उस अख़बार के पन्ने मे था उसके दोपहर का खाना | मैने गौड़ से देखा वो थी सिर्फ़ ३ रोटी और साथ मे कुछ भी नही| जिसे वो चुपचाप नज़रे झुकाए खा रहा था, उसके चेहरे पे कोई शिकायत न थी| यह दृश्या जैसे मानो मेरी मानस पटल पे स्थाई रूप से छप गयी हो|<br />
पिताजी ने जब मुझसे कहा की अब तुम्हारा नंबर आएगा साक्षात्कार के लिए  तो मैने अपने अंतर्मन मे कहा &#8211; मेरा साक्षात्कार तो हो गया &#8211; जिंदगी की एक बहुत बड़ी सच्चाई से | मैने पिताजी को वो युवक दिखाते हुए कहा कि &#8220;आज यहाँ किसी को इस नौकरी की सच मे ज़रूरत है तो वो उसे है, चलिए हम यहाँ से चलते हैं &#8220;| इतना सुनते ही मेरे पिताजी ने मुझे अपने मूक शब्दो मे शाबासी देते हुए मेरे समर्थन मे अपने सर हिलाया और मुझे गले से लगा लिया| मैं आज भी ऋणी हूँ उस साक्षात्कार का जो मेरा जिंदगी के उस पहलू से हुआ था |</p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/abhivyaktii.wordpress.com/27/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/abhivyaktii.wordpress.com/27/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/abhivyaktii.wordpress.com/27/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/abhivyaktii.wordpress.com/27/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/abhivyaktii.wordpress.com/27/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/abhivyaktii.wordpress.com/27/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/abhivyaktii.wordpress.com/27/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/abhivyaktii.wordpress.com/27/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/abhivyaktii.wordpress.com/27/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/abhivyaktii.wordpress.com/27/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/abhivyaktii.wordpress.com/27/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/abhivyaktii.wordpress.com/27/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/abhivyaktii.wordpress.com/27/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/abhivyaktii.wordpress.com/27/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=abhivyaktii.wordpress.com&amp;blog=8736772&amp;post=27&amp;subd=abhivyaktii&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://abhivyaktii.wordpress.com/2009/11/27/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>9</slash:comments>
	
		<media:content url="http://0.gravatar.com/avatar/addfa2eed21f7bb4fa5905778c1b3202?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">shashi</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>अशोक वाटिका</title>
		<link>http://abhivyaktii.wordpress.com/2009/09/25/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8b%e0%a4%95-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be/</link>
		<comments>http://abhivyaktii.wordpress.com/2009/09/25/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8b%e0%a4%95-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be/#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 25 Sep 2009 20:23:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shashi Sudhanshu</dc:creator>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://abhivyaktii.wordpress.com/?p=22</guid>
		<description><![CDATA[उन दिनो टेलीविज़न सिर्फ़ दूरदर्शन के नाम से जाना जाता था&#124; पूरे मोहल्ले मे एक-आध घर मे ही टेलीविज़न हुआ करता था&#124; ईश्वर की असीम अनुकंपा से हमारे मोहल्ले मे भी एक टेलीविज़न था&#124; पड़ोस के साहू जी के घर, बड़ा सा घर था उनका&#124; साहू जी के बंगले का पीछे वाला हिस्सा हमारे घर [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=abhivyaktii.wordpress.com&amp;blog=8736772&amp;post=22&amp;subd=abhivyaktii&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>उन दिनो टेलीविज़न सिर्फ़ दूरदर्शन के नाम से जाना जाता था| पूरे मोहल्ले मे एक-आध घर मे ही टेलीविज़न हुआ करता था| ईश्वर की असीम अनुकंपा से हमारे मोहल्ले मे भी एक टेलीविज़न था| पड़ोस के साहू जी के घर, बड़ा सा घर था उनका| साहू जी के बंगले का पीछे वाला हिस्सा हमारे घर की तरफ था, जिस तरफ दो खिड़कियाँ थी| उसमे से एक खिड़की उस कमरे की थी जिसमे उनका बड़ा सा टेलीविज़न होता था| बस रविवार की सुबह ९ बजे हम सब बच्चों का जमावड़ा वहीं लगता था| उस समी मेरी उम्र कुछ ३-७ साल रही होगी| रामायण देखने के लिए मन मे बड़ा उत्साह होता था| और हो भी क्यूँ ना, उस वक्त रामायण का सुंदरकांड चल रहा था, वो वानर सेना का उत्पात, शक्तिशाली हनुमान के पराक्रम, तीर धनुष का वो युद्ध मानस पटल को यूँ प्रभावित करते थे की माने सब वास्तविकता के ही पात्र हों|</p>
<p>लेकिन रामायण देखना मेरे लिए कोई भागीरथ प्रयास से कम ना था| एक तो पिताजी सुबेह के ५ बजे उठा देते थे, और शर्त ये होती थी की अगर रामायण देखने जाना है तो कम से कम ३-४ घंटे पढ़ाई करनी होगी, तब जाके कहीं ९ बजे छुट्टी मिलती थी| बस जैसे तैसे पढ़ाई पूरी करके मिनट की सुई इस से पहले की १२ तक पहुँचती, मैं साहू जी के खिड़की पे लटकने के लिए अपना नंबर लगा देता था| कमरे की खिड़की थोड़ी उँचाई पे थी, मैं ठीक से वहाँ तक पहुँच नही पता था| लेकिन मैने इस समस्या का भी समाधान निकाल लिया था| गली मे आख़िरी घर रामसगर महतो जी का था, और उनके यहाँ दूसरे तल्ले पे कुछ नये कमरे बन रहे थे| बस फिर क्या था, आँख बचा के चार इंट वहाँ से उठा लाया था| चार इंट एक पे एक चढ़ा के मैं उसपे चढ़ जाता तब जाके टेलीविज़न के दर्शन होते थे| लेकिन समस्या यहीं ख़तम ना होती| उस से भी बड़ी चुनौती थी उस खिड़की की बनावट| अगर खिड़की कोई सामानया होती तो उसकी सलाखे पकड़ के १ घंटा क्या रामायण देखने के लिए ५-६ घंटे भी खड़ा रह सकता था| लेकिन साहू जी ने मच्छरो से बचने के लिए खिधकी के बाहर से बारीक वाली एक जाल लगवा रखी थी| दरअसल उस जाल का असली मकसद ये था की आते जाते कोई उनकी घर के अंदर ना झाँक पाए| जिसकी वजह से जाल मे आँखे बिल्कुल सटानी पड़ती थी ताकि टेलीविज़न साफ साफ दिखे| छिपकीली के जैसे उंगलियों को उस जाल के बीच फसा के टिकाए रखना पड़ता था| लेकिन रामायण के आकर्षन मे इतना दम था की इन सब मुसीबतो पे ध्यान ही नही जाता था| मेरे साथ उस खिधकी पे लटकने वालों मे मेरे चचेरे भाई साहब, और मेरी ही उम्र के मुहल्ले के बाकी लड़के भी होते थे|</p>
<p>जो भी हो मैं उस धारावाहिक से बहुत ही प्रभावित हुआ था| टोकरी के घुमावदार लड़की का धनुष बनता था, और सिकी वाले झाड़ू के सिकी के तीर, या कभी छप्पर से सिकी निकाल लेता तीर बनाने के लिए| हर खेल मे उसी रामायण के पात्रो और वही पटकथा की झलक देने की कोशिश करता था| दीवाली आने वाली थी, हमारे यहाँ दीवाली मे सब लोग अपने घरो की सफाई करते हैं और दीवारों को चुने से रंगते हैं| या यूँ कहे की दीवाली के दिन सारा गाँव श्वेत दुग्ध सा निर्मल दिखता था तो कोई अतिशयोक्ति ना होगी| हमारा छत तीन तरफ से खुला था और चौथी तरफ चाचा जी का घर था जिधर के उँची से दीवार थी| जब कोई साथ देने वाला नही मिलता तो मैं उसी दीवार पे गेंद फेक फेक कर अकेला खेला करता था| दीवाली को अब बस ४ दिन ही बचे हुए थे, हमारे पूरे घर मे चुने से रंगाई हो चुकी थी, और वो दीवार भी अपने सफेद रंग से मानो प्रकाश फैला रही थी| उस दिन दोपहर को बहुत तेज बारिश होई थी| शाम ४ बजते बजते तक इंद्र देव ने थोड़ा आराम करने का सोचा| बस फिर क्या था बारिश रुकते ही मैं गेंद लेके छत पे पहुच गया| </p>
<p>छत के एक कोने मे कुछ पौधे लगे हुए थे| तेज बारिश के कारण मिट्टी गमले से निकल के इधर उधर बह आई थी| खेलते खेलते अचानक मेरी गेंद उस मिट्टी वाले पानी मे चली गई| गेंद रबर की बनी थी जो पानी सोख लेती थी| मैने जैसे ही इस बार गेंद को दीवार पे फेका, दीवार पे एक मिट्टी का एक गोल धब्बा लग गया और कुछ पानी उस धब्बे से होकर नीचे के ओर आने लगी| ना जाने कहाँ से मुझे ऐसा प्रतीत हुआ की ये तो एक पेड़ जैसे दिख रहा है|जैसे वो गोल धब्बा उस वृक्ष के घने पत्ते हो और वो पानी की धारा से बने निशान उसका तना | अलौकिक दृश्या था वो, और मैने सोचा अगर मैंने ऐसे और ढेर सारे धब्बे इस दीवार पे बनाए तो ये एक बगीचा जैसा दिखेगा &#8211; जैसे रामायण वाला अशोक वाटिका जहाँ सीता जी को बंदी बना के रखा गया था| बस फिर क्या था कुछ ही मिनतो मे पूरे छत के दीवार पे अशोक वाटिका का प्राण प्रतिष्ठान हो गया था| मैं मानो अपनी कलात्मक विद्या को देख के फूला ना समा रहा था| इतना सुंदर दृश्या मैने बनाया है मुझे यकीन ही न होता| मैने सोचा क्यूँ ना जाके सबको इस अशोक वाटिका के दर्शन कराए जाए| इतने मे माता जी छत पे आई, और जैसे ही उन्होने छत की दीवारो के हाल देखा, मानो अचेत हो गयी हो &#8211; उनके मुख से निकला &#8220;सत्यानास&#8221; और रामायण के अग्नि और सर्प बानो से भी कठोर आस्त्रा शस्त्र की वर्षा मेरे उपर होने लगी|</p>
<p>इस बार मुझे उनकी मार से दर्द नही हो रहा था, क्योंकि मेरे अंतर्मन मे यही सवाल गूँज रहे थे की &#8211; क्या मेरी कला का ये परितोशिक उचित था|</p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/abhivyaktii.wordpress.com/22/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/abhivyaktii.wordpress.com/22/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/abhivyaktii.wordpress.com/22/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/abhivyaktii.wordpress.com/22/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/abhivyaktii.wordpress.com/22/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/abhivyaktii.wordpress.com/22/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/abhivyaktii.wordpress.com/22/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/abhivyaktii.wordpress.com/22/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/abhivyaktii.wordpress.com/22/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/abhivyaktii.wordpress.com/22/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/abhivyaktii.wordpress.com/22/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/abhivyaktii.wordpress.com/22/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/abhivyaktii.wordpress.com/22/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/abhivyaktii.wordpress.com/22/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=abhivyaktii.wordpress.com&amp;blog=8736772&amp;post=22&amp;subd=abhivyaktii&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://abhivyaktii.wordpress.com/2009/09/25/%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%8b%e0%a4%95-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>12</slash:comments>
	
		<media:content url="http://0.gravatar.com/avatar/addfa2eed21f7bb4fa5905778c1b3202?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">shashi</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>अधूरा कर्तव्य</title>
		<link>http://abhivyaktii.wordpress.com/2009/08/21/%e0%a4%85%e0%a4%a7%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af/</link>
		<comments>http://abhivyaktii.wordpress.com/2009/08/21/%e0%a4%85%e0%a4%a7%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af/#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 21 Aug 2009 12:32:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shashi Sudhanshu</dc:creator>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[लघु कथा]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://abhivyaktii.wordpress.com/?p=15</guid>
		<description><![CDATA[दिन चढ़ आया था, चिड़ियॉँ आ-आकर आंगन में फुदकने लगीं थी, कोई ओखली पर बैठी, कोई तुलसी के चौतरे पर, अभी तक तो दादी गंगा स्नान करके आ जाती थी पर आज क्या हो गया&#124; मेरी आयु चार-पाँच वर्ष की रही होगी, तब घड़ी देखना और समय का ज्ञान न था फिर भी बालपन मे [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=abhivyaktii.wordpress.com&amp;blog=8736772&amp;post=15&amp;subd=abhivyaktii&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>दिन चढ़ आया था, चिड़ियॉँ आ-आकर आंगन में फुदकने लगीं थी, कोई ओखली पर बैठी, कोई तुलसी के चौतरे पर, अभी तक तो दादी गंगा स्नान करके आ जाती थी पर आज क्या हो गया| मेरी आयु चार-पाँच वर्ष की रही होगी, तब घड़ी देखना और समय का ज्ञान न था फिर भी बालपन मे इंद्रियाँ इतना तो ज़रूर समझती थी कि अब दादी आएगी और अपने पूजा की डलिया निकाल के  माकुनदाने का प्रसाद देगी| तभी श्वेत सूती साडी मे डगमग कदमो से बढ़ते हुए वो दुर्बल सी आकृति दिखी| मैने दौड़ लगाई और हवा से बाते करता हुए दादी के पास पहुच गया| दादी ने अपनी बूढ़ी और निर्बल आवाज़ को थोड़ा क्रोधित स्वर देनी की असफल प्रयास करते हुए मुझे डाट लगाई &#8211; &#8220;अरे अरे हमरा गिरा देवे का, चल भाग इन्हा से, हाथ निम्मन हाउ की जुठ्ठे हाथ घूमते हैं, सब पूजा के समान अपवित्तर करवे का, जो जाके हाथ धो के आओ&#8221; | इस से पहले की उनके स्वर मेरे कानो तक पड़ते, मैं पूजा का डलिया उनके हाथो से छीन चुका था| उस डलिया मे एक पीतल की छोटी सी कटोरी होती थी खिलौने जैसी, जिसमे गिन के तीन चीनी के बने हुए प्रसाद मे चढ़ाए जाने वाले माकुनदाने और एक तुलसी का पत्ता होता था| गंगा जल के छींटे पड़ने से वो सब थोड़े घुल जाते थे, फिर भी उनको खाने मे जो स्वाद और आत्मीय आनंद की प्राप्ति होती थी वो अविस्मरणीय है| इन वर्षो मे दादी को अब पता चल गया था की उनकी धमकिया व्यर्थ जाएगी और यूँ खून जलाने से मेरे व्यवहार मे कोई परिवर्तन नही आने वाला| अगर माँ या पिताजी आस पास रहते तो मुझे भारी मन से प्रसाद के वो दो दाने सबको बाँटना पड़ता था|</p>
<p>सामूहिक परिवार होने से माँ पूरा दिन घर के काम मे लगी रहती थी, पहले तो दादी मुझे बहला फुसला के गोदी मे बैठाए रखने मे सफल हो जाती थी, लेकिन जैसे जैसे समय बीतता गया मेरी बदमाशियाँ भी बढ़ते जाती और दादी मुझे संभालने मे अपने आप को असमर्थ पाती| अब दादी लाठी का सहारा लेके चलती थी| दादी कभी कभी अपना खाना अलग बनाती थी क्यूंकी उन्हे सादा खाना पसंद था, बिना लहसुन, प्याज और मसाले के| असल बात ये है की वो बहुत ही स्वाभिमानी थी| आत्मसम्मान उनमे कूट कूट कर भरा था इसीलिए वो कभी कभी ये भी जताने के लिए की वो किसी पे आश्रित नही है, अपना चूल्हा खुद जलाती थी| अपने लिए उन्होने सारे छोटे छोटे बर्तन भी अलग रखे हुए थे|दादी को अपनी कोठरी से बड़ा लगाव था, मिट्टी की कोठरी, लकड़ी की एक खाट, और कपड़े की कतरन से बना उनका बिछौना जिसे उन्होने खुद अपने हाथो से बनाया था| दादाजी की सारी निशानियाँ उन्होने उसी कोठरी मे संभाल कर रखी थी| उस कोठरी मे मिट्टी से लीपा पोती भी वो खुद ही करती थी| हर साल जाड़े से पहले वो अपनी उनी कपड़े धूप मे सुखाने के लिए डालती थी, जिसपे मैं लोट लोट के उन्हे परेशान किया करता था| दादी की आँखे अब बूढ़ी और कमजोर हो चली थी फिर भी उनके स्वाभिमान मे इतना दम था जिसके बल पे वो अपना पुराना कंबल जो जहाँ तहाँ से फट गया था, खुद सुई धागे से सिल लिया करती थी|</p>
<p>दादी को सुबह शाम उनकी आँख मे दवाई डालने की ज़िम्मेदारी मेरी थी| बस पूरे दिन मे शायद वही एक पल ऐसा होता होगा जब मुझे उनको सताने का दिल नही करता था| जब मैं अपने मजबूत हाथों से उनकी काँपति पलको को अलग करता और जैसे ही दवाई की बूंदे उनकी आँखो मे जाती, उनके दर्द का अहसास मुझे भी होता था| उस समय मानो वो एक छोटे बच्चे की तरह करती और मैं उन्हे एक पिता की तरह संतावना देता की &#8211; बस बस हो गया, अब दर्द नही होगा, ये तो आपके आँखो के लिए ही है ना| दादी आँखे बंद किए रहती और मैं दवाई की शीशी उनके हाथो मे पकड़ा कर वापस खेलने भाग जाता|</p>
<p>दादी अपने पास कुछ पैसे हमेशा बचा के रखती थी जिस से वो अपने लिए कुछ फल खरीदा करती थी| हर दोपहर को एक फल बेचने वाली आती थी दादी उसी से फल लिया करती थी| दादी ये भी ध्यान मे रखती की मैं उस समय आस पास ना रहूं| मेरी अनुपस्थिति मे ही वो चैन से आराम से फल चुन चुन के खरीद सकती थी| और जब भी दादी कभी चना, भुन्जा या कोई फल खाती तो मैं वहाँ पहुच जाता था| दादी जो भी खाती थी मुझे थोड़ा थोड़ा अवश्य दिया करती थी, और मैं लालची की तरह और ज़्यादा पाने की चाह मे जल्दी जल्दी चबा जाता और, और माँगता | मैं इतना उदंड हो गया था की जब दादी मना करती तो उनके कटोरी मे से छीन के भाग जाता| मुठ्ठी वाला भूंजा ख़तम होते ही मैं वापस आता, दादी दूर से मुझे आते देख सतर्क हो जाती और  मुझे चेतावनी देती की &#8211; &#8220;तू हमरा संतलत से खाए देबे की ना&#8221; | और मैं उनके इर्द गिर्द मंडराते रहता और साम दाम दंड भेद सारी नीतिया अपनाता की बात बन जाए और, और एक मुठ्ठी भूंजा मिल जाए| मैं कहता &#8211; &#8220;दादी मुझे नही दोगी भूंजा, मैं तो तेरा पोता हूँ ना&#8221; | दादी कहती &#8211; &#8220;चल भाग इहा से, बड़ा आया पोता चोता बनने, कोई पोता का ऐसे बुढ़िया दादी के परेसान करे है का| जब अपन कंधा पे चढ़ा के हमरा मंज़िल ले जईबे तब तू हमर पोता बनबे&#8221;|</p>
<p>जैसे जैसे दिन बीतने मेरी उदन्डता जैसे आसमान छूने लगी| जाड़े का मौसम आ गया था, शीतलहरी चलने लगी थी| हमारे यहाँ जड़े के मौसम मे झंगरी (हरा चना) बहुत मिलता है| दादी की एक सहेली हुआ करती थी, उसका असली नाम तो पता नही लेकिन सब उसने अनरीया के नाम से पुकारते थे| वो चौराहे पे झंगरी बेचा करती थी, वो झंगरी के ढेर सारी गठरियाँ दादी को दे जाती थी| दादी उनमे से हरे चने के दाने निकल के रखती जिसे हर शाम को अनरीया लेके बेचने जाती थी| दादी को थोड़े बहुत पैसे भी मिल जाते थे| अनरीया जानती थी की घर मे बच्चे हैं तो थोड़ा बहुत झंगरी खाएँगे ही, जिस से उसे कोई आपत्ति नही थी| दादी हमे 2-4 गुच्छे दे देती की ले जाओ और उसमे से दाने निकाल निकाल के खाते रहो| लेकिन अब तक मैं अपनी बढ़ती बदमाशियों का ऐसा अधीन बन गया था की ईमानदारी वाली कोई बात मेरे समझ मे नही आती थी| </p>
<p>दादी जब झंगरी छीलने बैठती तो निकले हुए हारे चने के दानो को एक पुराने लोटे मे जमा करती थी, जिसे वो मुझसे छुपा के अपनी गोद मे आँचल के नीचे रखती| मैं आँख बचाते प्रकाश की गति से भी तेज आता और एक झटके मे लोटे मे से छिले हुए हरे चने एक मुठ्ठी मे लेके भाग जाता| ये भी नही सोचता की वो एक मुट्ठी चना निकलने मे दादी को कितना समय और मेहनत लगा होगा| दादी बस क्रोध से मुझपे चिल्लाते रह जाती| पिताजी से शिकायते हुई, मार भी पड़ी लेकिन मेरी इस हरकत को कोई रोक न सका| कभी दादी के कोठरी मे लूका छिपी खेलने के लिए छिप जाता, शोर मचाता, उनकी पुरानी चीज़ो को इधर उधर कर देता, कभी उनकी लाठी लेके छप्पर पर से गेंद निकालने चला जाता| मैं कई बार दादी की लाठी लेके रामायण या महाभारत का युद्ध वाला खले खेलने चला जाता और इधर उधर छोड़ आता, जिसे बाद मे दादी ढूँढ ढूढ़ कर परेशान हो जाती थी</p>
<p>दादी अब और बूढ़ी हो गयी थी, शरीर मे कोई विकार या कोई बीमारी ना थी लेकिन बुढ़ापे मे दुर्बलता तो आ ही जाती है| अब वो गंगा स्नान के लिए जाने मे असमर्थ थी| दिन भर घर पे ही बैठती | अब मैं भी स्कूल जाता था सो दोपहर मे उनके पास अब कोई रामायण और हनुमान जी की कहानी सुनने वाला भी कोई नही था, कभी मन ना लगा तो चौराहे पे जाके बैठती थी, आते जाते लोगो देखती थोड़ा बाहर का हवा मिल जाता तो उनका मन बहल जाता था| अब मुझमे भी थोडी  समझ आने लगी थी|  पिताजी जब  अपने पुराने दिनो की कहानिया सुनाते तब दादी ने जिस तरह से अपने परिवार का पालन किया वो मुझे बहुत गौरवान्वित महसूस करवाता था| पिताजी के वर्णित कथन मानो मैं साफ साफ देख सकता था &#8211; दादी का वह धैर्य, वह आत्मबल, जो निर्धनता और मुस्किल के वक्त भी अटल रहा था, वह मुस्कराहट जो उस समय भी उनके अधरों पर खेल रही थी; वह आत्मभिमान, जो उस समय भी उनके मुख से टपक रहा था, क्या मेरे हृदय से कभी विस्मृत हो सकता था| कितनी ही राते फाकों से गुजरीं, बहुधा घर में दीपक जलने की नौबत भी न आती थी, पर दीनता के आँसू कभी उनकी ऑंखों से न गिरे। </p>
<p>अब दादी के साथ किए गये वार्ताव मुझे लज्जित करने लगे थे| लेकिन अब पिताजी का तबदला दूसरे शहर बरौनी मे हो गया था| और दादी अभी भी चाचा जी के साथ पटना मे रहती थी| मैं सोचा की इस बार जब दशहरे मे दादी से मिलने घर जौआंगा तब मैं उनकी खूब सेवा करूँगा और उन्हे ये भी बता दूँगा की मैं अपने करनी पे लज्जित हूँ| जब दशहरे पे घर पहुचा तो दादी मुझे देख के बहुत खुश हुई, उनकी बूढ़ी पथराई आँखें शायद अब वही ठिठोली ढूँढ रही थी| शायद अंतर्मन से मेरा उनको सताना उन्हे भी अच्छा लगता था| वो मेरा नाम भी सही तरीके से नही ले पाती थी| हिन्दी के सारे शब्द अपनी अपभ्रंश मगही भाषा मे बोलती थी| उस बार मैं दादी को लेके चौराहे पे गया और दुर्गा पूजा की प्रतिमाएँ जब विसर्जन के लिया गुजरती तो उनको सब दर्शन करवाए और उनके लिए मिठाई भी खरीदा| </p>
<p>1997 मैं मैट्रिक मे था| बोर्ड परीक्षा थी और आज गणित का पर्चा था| बड़े भाई साहब उन दीनो इंजिनियरिंग की पढ़ाई पटना मे कर रहे थे| मैं सुबह पाँच बजे ही उठ गया था, पिताजी पूजा के लिए फूल लाने गये थे| साढ़े छे बजे घर पे फ़ोन की घंटी बजी| फ़ोन के दूसरे तरफ बड़े भाई साहब थे, आवाज़ आई &#8211; &#8220;दादी नही रही&#8221; |मेरे पैर ज़मीन को टटोलने लगे| गला रुंध गया, एक विशाल संताप मेरे आँखो से छलक पड़ा| माँ और पिताजी खबर मिलते ही पटना के लिए निकल गये और मुझे परीक्षा देने भेज दिया गया| विधाता मेरे साथ इतना क्रूर व्यवहार करेगा इसका अंदाज़ा ना था| मैं अपने दादी के अंतिम दर्शन तक ना कर सका| वो जिंदगी भर कहते रही &#8211; जब तू मुझे अपने काँधे पे चढ़ाएगा तब तू मेरा पोता कहलाएगा | शायद बूढ़ी दादी को सताने का इस से बड़ा दंड विधाता को मेरे लिए ना मिला हो &#8211; की मैं ऋणी रहूं और मेरा ये कर्त्व्य जिंदगी भर अधूरा रहे|</p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/abhivyaktii.wordpress.com/15/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/abhivyaktii.wordpress.com/15/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/abhivyaktii.wordpress.com/15/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/abhivyaktii.wordpress.com/15/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/abhivyaktii.wordpress.com/15/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/abhivyaktii.wordpress.com/15/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/abhivyaktii.wordpress.com/15/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/abhivyaktii.wordpress.com/15/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/abhivyaktii.wordpress.com/15/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/abhivyaktii.wordpress.com/15/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/abhivyaktii.wordpress.com/15/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/abhivyaktii.wordpress.com/15/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/abhivyaktii.wordpress.com/15/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/abhivyaktii.wordpress.com/15/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=abhivyaktii.wordpress.com&amp;blog=8736772&amp;post=15&amp;subd=abhivyaktii&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://abhivyaktii.wordpress.com/2009/08/21/%e0%a4%85%e0%a4%a7%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>8</slash:comments>
	
		<media:content url="http://0.gravatar.com/avatar/addfa2eed21f7bb4fa5905778c1b3202?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">shashi</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>साइकल की सवारी</title>
		<link>http://abhivyaktii.wordpress.com/2009/08/11/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%95%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80/</link>
		<comments>http://abhivyaktii.wordpress.com/2009/08/11/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%95%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 11 Aug 2009 12:13:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shashi Sudhanshu</dc:creator>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[लघु कथा]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://abhivyaktii.wordpress.com/?p=9</guid>
		<description><![CDATA[मेरा पढ़ने मे बिल्कुल जी न लगता था&#124; एक घंटा भी किताब लेकर बैठना पहाड़ लगता था&#124; मौका पाते ही पास के कोलेजिअट मैदान मे भाग आता था&#124; किसी खिलोने की जैसे कोई आवशयक्ता ही न थी, कंकारिया उछालता, तितलियों के पीछे दौड़ता, कहीं कोई साथी मिल जाए तो पूछना ही क्या&#124; शाम के पाँच [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=abhivyaktii.wordpress.com&amp;blog=8736772&amp;post=9&amp;subd=abhivyaktii&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मेरा पढ़ने मे बिल्कुल जी न लगता था| एक घंटा भी किताब लेकर बैठना पहाड़ लगता था| मौका पाते ही पास के कोलेजिअट मैदान मे भाग आता था| किसी खिलोने की जैसे कोई आवशयक्ता ही न थी, कंकारिया उछालता, तितलियों के पीछे दौड़ता, कहीं कोई साथी मिल जाए तो पूछना ही क्या| शाम के पाँच बजे पड़ोस के एड्वोकेट बाबू अपने पोते को साइकल सिखाने आते थे| उनके आते ही जैसे मैं मंत्रमुग्ध हो जाता था| वो लाल रंग की साइकल, पीले चटकीले सीट, सहारा देने के लिए उसमे दोनो ओर पहिए भी लगे हुए थे| मेरा मन मचल उठता था एक बार साइकल को छू के देखने को| मैं उस वक्त प्रथम वर्ग मे था, अभी पिछले महीने ही अपने पास के स्कूल से निकल के केन्द्रिय विद्यालय मे दाखिला लिया था, जहाँ मेरे बड़े भाई साहब पढ़ते थे| बड़े भाई साहब चौथी जमात मे थे और मैं पहले मे | एक दिन मेरे खुशी का ठिकाना न रहा जब मैं खेल के घर आया तो देखता हूँ वही मेरे सपने वाली लाल साइकल आँगन मे खड़ी है| उसपे सदाबहार फूलों की एक छोटी सी माला और रोली का टीका लगा हुआ था| पहली बार मेरा ध्यान प्रसाद मे चढ़े हुए मोतीचूर के लड्डू पे ना होके कहीं और था, मैं जैसे टकटकी लगाए हुए साइकल  को देखते ही जा रहा था| बार बार पिताजी से पूछ रहा था &#8211; &#8220;बाबा क्या ये मेरा साइक्ल है&#8221;| तभी कानो मे बड़े भाई साहब की तीखे स्वर आए &#8211; नही ये सिर्फ़ मेरा साइकला है| पिताजी ने समझाया की ये सबका साइकला है और सब इसे बरी बरी चलाएँगे, लेकिन भाई साहब की विद्रोही आँखे ये सह कह रही थी की वो इस से सहमत नही है| पिताजी हमे सुबह के पाँच बजे उठाया करते थे, साइकल चलाने के जोश मे इतनी सुबह उठना गवारा ना लगता था| बड़े भाई साहब का साइकल पे वर्चस्प था, मैदान तक जाते वक़्त और घर आते वक़्त साइकल उन्हे ही चलाने मिलता था| हमारी किस्मत तभी जागती थी जब या तो भाई साहब थक जाते थे या फिर पिताजी उन्हे बराबरी और भाईचारे की पाठ पढ़ाते थे| बड़े अनुनय निवेदन के बाद मुझे साइकल चलाने मिलता था| और कभी अगर भाई साहब खंबे से टकरा गये तो घर आते वक़्त साइकल चलाने का मौका मुझे मिलता था|</p>
<p>जैसे जैसे  दिन बीतते गये, वो साइकल छोटी होने लगी थी| अब मैं चौथी मे था, दीदी छठी मे और बड़े भाई साहब सातवी मे| उस साल दशहरे के दिन पिताजी जैसे ही बाहर से आए कहने लगे चलो तीनो त्यार हो जाओ आज हम बाहर जायंगे|  रास्ते भर मैं पिताजी से पूछता रहा &#8211; बाबा हम कहाँ जा रहे हैं- मेला देखने, मिठाई खाने, खिलौने लेने या पूजा की कोई सामग्री रह गयी? मन तब तक बेकाबू था जब तक की हम साइकल के दुकान पे पहुँच ना गये| मेरी तो मानो खुशी का ठिकाना न रहा| लेकिन ये खुशी सिर्फ़ क्षणिक थी| जैसे ही पिताजी नि सिर्फ़ दो साइकल दिखाने को कहा मैं समझ गया की साइकल सिर्फ़ बड़े भाई साहब और दीदी के लिए लिए जा रहे हैं| मेरे चकनाचूर हुए सपने और अंदर का विलाप दोनो हृदय से होते हुए आँखो से  छलक पड़े| तब कानो मे ना तो पिताजी के संतावना भरे स्वर सुनाई देते थे और ना ही पास के दुर्गा पूजा पंडाल से आने वाली लाउडस्पिकर की आवाज़| बस भोला सा मन रोना चाहता था, बिना इस बात की चिंता किए की दुकानदार क्या सोचेगा| और तब तो दुख छिपाने की कला भी नही आती थी| सब लोग घर आए और पूजा मे सम्मलित हो गये, लेकिन मेरा मन अभी भी संताप से उभरा नही था और बार बार क्रोध से ये पूछता की मेरी साइकल क्यूँ नही आई और फिर मुझे क्यूँ लेके गये थे|</p>
<p>दिन पर दिन ये दुख विद्रोह का रूप लेता गया| पिताजी ने समझाया की जब मैं छठी पास करूँगा तब मेरी भी साइकल आएगी| इस संतावना मे दिन गुजरने लगे| धीरे धीरे मैं इस दुख को भूलने लगा, अब तो बस बड़े भाई साहब के इर्द गिर्द ही उनकी जी हुज़ूरी मे दिन कटने लगे| बड़े भाई साहब कभी अपनी साइकल को हाथ तक न लगाने देते थे लेकिन मैने इस लालच मे की शायद उनका दिल कभी पिघल जाए मैं हर छुट्टी वाले दिन खुद उनकी साइकल साफ किया करता था| लेकिन इस से भी बात न बनी| अब मेरे पास चोरी से साइकल लेके भागके चलाने के अलावा और कोई रास्ता न था| गर्मियो की छुट्टी थी, सब लोग दोपहर मे सोते थे जबकि मेरा मन तभी सबसे ज़्यादा फुर्तीला होता था| भाई साहब के चाभी छुपाने के सभी जगहो से मैं वाकिफ़ था| चुपके से चाभी ली और साइकल लेके भाग गया मैदान मे| ये पता होते हुए भी की वापस जाने पे लात जुतो से भाई साहब स्वागत के लिए खड़े होंगे, मेरा मन ये कहता ही की क्यूँ न साइकल का इतना आनंद ले लिया जाए की मार की चोट समझ मे ही ना आए|</p>
<div><span style="font-family:0;"><span style="line-height:normal;white-space:pre-wrap;">ये सब बस यूँही चलता रहा और मेरे इंतेज़ार की घड़िया एक दिन समाप्त हो गयी| मैंने छठी क्लास पास होते ही परीक्षा परिणाम वाले दिन ही पिताजी को साइकल की याद दिलाई, जिसे पिताजी बड़े आराम से दशहरे तक टाल गये| बोले सबकी साइकल दशहरे की दिन आई थी तुम्हारी उस से पहले कैसे आएगी| मैने सोचा चलो जहाँ दो साल इंतेजार किए तो 6 महीने और सही| दशहरे आते ही मुझसे अब रहा ही ना जाए| अष्टमी के दिन ही पिताजी से कहा &#8211; बाबा साइकल| इस बार पिताजी ने बहाने का ऐसा राम बान चलाया जिस से बचना मुस्किल था| या यूँ कहें की ब्र्ह्माश्त्र जिसे स्वयम् ब्रह्मा भी असाध्य नही कर सकते थे| पिताजी बोले लेकिन तुमने अपने वर्ग मे तो कोई स्थान ही प्राप्त नही किया| देखो तुम्हारे बड़े भाई साहब वर्ग मे प्रथम आते हैं, दीदी भी अपने वर्ग मे प्रथम आती है, और एक तुम हो कम से कम दूसरे या तीसरे स्थान भी प्राप्त कर लो तो साइकल आ जयगी| तब मैं समझ गया की अब जीवन मे मेरा साइकल कभी नही आएगा| जो कभी वर्ग मे पहले 20 मे नही आया वो भला प्रथम कैसे आएगा| मेरे आँखो से मेरे ख्वाब बाहर आने लगे| इस बार अपने आप को धोखित देखके और भी बुरा लग रहा था| अब जीवन मे कोई सपना नही देखूँगा सोचके मैं इस खून के घूँट को पी तो गया| लेकिन इसका परिणाम बहुत बुरा हुया| मैं और विद्रोही हो गया था| भाई साहब की साइक्ल चुरा के ले जाता ढीढ़ की तरह और आने के बाद हँस हँस के मार ख़ाता था| कभी कभी तो कोई मेहमान अपनी साइकल लेके आता तो उसे भी ले भागता था और जब तो वो बैठते और नासत्ता करके तब तक मैं एक दो चक्कर मरके आता था|</span></span></div>
<div><span style="line-height:normal;white-space:pre-wrap;"><span style="line-height:19px;white-space:normal;"><br />
</span></span></div>
<div><span style="font-family:0;"><span style="line-height:normal;white-space:pre-wrap;">उस साल मेरा परीक्षा परिणाम बहुत बुरा आया, पहले तो वर्ग मे 20 -22 स्थान मे आता था इस बार अनुतीर्ण होते होते बचा| सब लोगो ने उम्मीद छोड़ दी थी, और मुझे भी कहाँ किसी की फ़िक्र थी| और ये सब मैं जान बुझ के किया था| उसी साल पिताजी का तबादला दूसरे शहर मे हो गया| सांगी साथी सब छूटे गये| अब तो बदमाशियों मे भी दिल ना लगता था| मैं इस बार आठवी जमात मे आ गया था| घर वालो को मेरे बोर्ड परीक्षा को लेके बहुत चिंता थी लेकिन मैं पूरे तरह से बदला लेने के लिए त्यार था, घरवालों से ये अपने आप से, पता नही किस से| रविवार का दिन था, पिताजी दोपहर मे मुझसे कहने लगे किसी को कुछ कहना मत, बस त्यार हो जाओ फटाफट| मैने उनकी आँखो मे वही चमक देखे जो बड़े भाई साहब के साइकल लाने वाले दिन थी| लेकिन क्या मेरा साइकल आयगा और मेरा साइकल कैसे और क्यूँ आएगा| यकीन नही हुआ लेकिन फिर भी पिताजी के साथ चल पड़ा| जब साइकल की दुकान पे पहुचे तब भी यकीन नही हुआ| पिताजी ने पूछा &#8211; क्यूँ कौन सा साइकल चाहिए| इस बार मेरा गला रुंध सा गया था, अचानक आँखे भर आई और मूह से एक आवाज़ नही| अब तो इतना बड़ा हो गया था की दुकानदार के सामने आँसू नही बहा सकता था|</span></span></div>
<div><span style="line-height:normal;white-space:pre-wrap;"><span style="line-height:19px;white-space:normal;"><br />
</span></span></div>
<div><span style="font-family:0;"><span style="line-height:normal;white-space:pre-wrap;">बस सर हिला के पिताजी को मन ही मन मूक शब्दो मे धन्यवाद कहते रहा| पिताजी ने भाई साहब से भी अच्छी वाली साइकल मुझे दिलाई| उधर मेरा चिर संयोजित बाल स्वप्न यथार्थ का रूप ले रहा था और इधर मेरे मन मे प्रसन्नता और कृत्यगता के बीच दव्न्द चल रहा था| एक तरफ खुशी थी तो दूसरी तरफ मैं लज़्ज़ित था अपने आप से और ये कह रहा था की  शायद मैने बड़े भाई साहब के जैसे इस साइकल को हासिल करने के लिए कुछ भी अच्छा नही किया आज तक| घर पहुचा तो सब लोग बहुत खुश थे, जब भाई साहब ने भी साइकल की बधाई दी तो आँखे अपने आप को रोक ना सकी| भाई साहब ने कहा &#8211; मुझे चलाने दोगे, और मैने खुशी खुशी चाभी उनके हाथ मे दे दी|</span></span></div>
<div><span style="font-family:0;"><span style="line-height:normal;white-space:pre-wrap;"><br />
</span></span></div>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/abhivyaktii.wordpress.com/9/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/abhivyaktii.wordpress.com/9/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/abhivyaktii.wordpress.com/9/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/abhivyaktii.wordpress.com/9/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/abhivyaktii.wordpress.com/9/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/abhivyaktii.wordpress.com/9/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/abhivyaktii.wordpress.com/9/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/abhivyaktii.wordpress.com/9/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/abhivyaktii.wordpress.com/9/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/abhivyaktii.wordpress.com/9/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/abhivyaktii.wordpress.com/9/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/abhivyaktii.wordpress.com/9/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/abhivyaktii.wordpress.com/9/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/abhivyaktii.wordpress.com/9/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=abhivyaktii.wordpress.com&amp;blog=8736772&amp;post=9&amp;subd=abhivyaktii&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://abhivyaktii.wordpress.com/2009/08/11/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%95%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>48</slash:comments>
	
		<media:content url="http://0.gravatar.com/avatar/addfa2eed21f7bb4fa5905778c1b3202?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">shashi</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>हम किस गली जा रहे हैं&#8230;</title>
		<link>http://abhivyaktii.wordpress.com/2009/07/26/%e0%a4%b9%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8-%e0%a4%97%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82/</link>
		<comments>http://abhivyaktii.wordpress.com/2009/07/26/%e0%a4%b9%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8-%e0%a4%97%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82/#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 26 Jul 2009 11:31:03 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shashi Sudhanshu</dc:creator>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://abhivyaktii.wordpress.com/?p=3</guid>
		<description><![CDATA[क्यों कोई ठहर जाता है यूँ ही चलते चलते इस महानगरी मे और क्यूँ कोई ये महानगरी खुद नही थमती एक पल को भी,  जबकि सच तो ये है की इस शहर को एक महानगरी बनाने वाला कोई और नही हम और आप हैं &#124; प्रकीर्ति की ये शायद अजीब विडंबना रही है की मनुष्य [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=abhivyaktii.wordpress.com&amp;blog=8736772&amp;post=3&amp;subd=abhivyaktii&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>क्यों कोई ठहर जाता है यूँ ही चलते चलते इस महानगरी मे और क्यूँ कोई ये महानगरी खुद नही थमती एक पल को भी,  जबकि सच तो ये है की इस शहर को एक महानगरी बनाने वाला कोई और नही हम और आप हैं | प्रकीर्ति की ये शायद अजीब विडंबना रही है की मनुष्य सोचता है की उसने अपनी जीवन शैली को अपने मान मुताबिक बना लिया है,  मगर सच्चाई को मेरी नज़रिए से देखें तो वो कुछ यूँ नज़र आएगी की आपके जीवन शैली ने आपको अपने वश मे कर लिया है| वरना क्यूँ तापमान का पारा तीस पर करते ही अब हमे वातानुकूलित कमरे की चाह जाग जाती है, जबकि कभी वो दिन भी थे जब बयालीस डिग्री मे भी पंखे के तले चैन की नींद सोते थे| क्यूँ आज स्पार्क या स्विफ्ट कार भी छोटी दिखती है, जबकि एक दिन वो भी था जब ऑटो मे पहले से बैठे 6 लोगों की बीच मे भी सातवाँ स्थान अपने लिए बड़े आराम से बना लेते थे| कभी वो दिन थे की दोस्तों के साथ सड़क की किनरो सबसे ज़्यादा गोल गप्पे खाने की प्रतियोगिता करते थे, और आज किसी मँहगे रेस्तराँ मे सादा पानी के जगह मिनरल वॉटर माँगते हैं, क्या हम सचमुच अपने स्‍वास्थ्य को लेके सजग हो गये हैं या ये भी इस महानगरी की किसी विस्मायाधि हवायों का असर है| क्या ये सच है की ये महानगरी जितना हमे देती है उतना कुछ छीन भी लेती है| एक तरफ हम घर से दफ़्तर चलके जाना नही चाहते और दूसरी तरफ पसीने बहाने के लिए फुल्ली ऑटोमेटेड ट्रेडमिल | आज अनायास ही अंतर्मन मे ये विचार आया की हम किस गली जा रहे हैं&#8230;?</p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/abhivyaktii.wordpress.com/3/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/abhivyaktii.wordpress.com/3/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/abhivyaktii.wordpress.com/3/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/abhivyaktii.wordpress.com/3/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/abhivyaktii.wordpress.com/3/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/abhivyaktii.wordpress.com/3/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/abhivyaktii.wordpress.com/3/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/abhivyaktii.wordpress.com/3/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/abhivyaktii.wordpress.com/3/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/abhivyaktii.wordpress.com/3/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/abhivyaktii.wordpress.com/3/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/abhivyaktii.wordpress.com/3/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/abhivyaktii.wordpress.com/3/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/abhivyaktii.wordpress.com/3/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=abhivyaktii.wordpress.com&amp;blog=8736772&amp;post=3&amp;subd=abhivyaktii&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://abhivyaktii.wordpress.com/2009/07/26/%e0%a4%b9%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8-%e0%a4%97%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
	
		<media:content url="http://0.gravatar.com/avatar/addfa2eed21f7bb4fa5905778c1b3202?s=96&#38;d=identicon&#38;r=G" medium="image">
			<media:title type="html">shashi</media:title>
		</media:content>
	</item>
	</channel>
</rss>
